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    "Freedom" - Fundamental attitude

    भारत के स्वतन्त्रता सेनानीयो का स्वतन्त्रता संग्राम के समय का नारा था - "पराधीन स्वपनेहू सुख नहिं, स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है"। इस नारे के उदघोष में मनोवैज्ञानिक अकाट्य सत्य एक उत्साहवर्धक आवाज में कहा गया है। असल में मनोविज्ञान के गहरे तलों की यदि बात करें तो कह सकते हैं कि प्रत्येक मनुष्य आदि काल से अनेक प्रकार से अनेक रूपों की स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए ही लालायित है और अनेक प्रकार के प्रयास करता रहा है। क्योंकि मनुष्यों के जेहन में कम या ज्यादा के अनुपात के हिसाब से परतंत्रता की अनुभूति बहुत पुरानी है। चेतना के लिए यह कहा जा सकता है कि वह इस स्वतन्त्रता और परतंत्रता के अविनाशी खेल में ज्ञात या अज्ञात रूप से संलग्न है पुरुषार्थ रत है।स्वतन्त्रता के कई आयाम हैं। अध्यात्म भी और कुछ नहीं है, बल्कि यह भी अन्यान्य रूपों में अन्यान्य तरीके से स्वतंत्र (आकार/निराकार/पवित्र) स्थिति की अनुभूति के लिए बौद्धिक, अंतः प्रज्ञा की जागृति और योग की अलौकिक स्थिति के निर्माण करने का ही उद्देश्य है। आकार, निराकार या पवित्रता की स्थिति भी सर्व प्रकार की स्वतंत्रता का आधार है/शीर्ष पर है। जो मनुष्य जितना ज्यादा स्वतंत्र है या जितना ज्यादा स्वतंत्रता की अनुभूति करता है या स्वतन्त्रता की अनुभूति के लिए जितना ज्यादा तीव्रता से अनेक प्रकार का पुरुषार्थ करने में तत्पर है वह मनुष्य चेतना के विकास की यात्रा में उतना ही ज्यादा आगे है। "पवित्र बनो। योगी बनो।" - यह परमात्मा का परम स्वतन्त्रता के लिए ही परम उदघोष है। इसलिए मनुष्य को स्वतन्त्रता के मूल्य को समझना चाहिए। ना स्वयं परतंत्रता में रहें और ना दूसरों को परतंत्र करें। उनमें ज्ञान योग की इतनी प्रतिष्ठा कर दें ताकि वे जन्म जन्म स्वतंत्रता का अनुभव करते रहें।