• msr_prose 16w

    हर घड़ी....

    हर घड़ी तेरे इंतज़ार में, मैं पागल इस कद्र हुआ,
    इज्तिराब-ए-महफ़िल में शराब को भी न छुआ
    इन संगीन राहों और ऊंचे अगरोचो में,
    ढूंढा मैंने युंकि पग भर गए मोचों में।
    अब लगता है कि तुझसे रूबरू होने का
    कोई और समूचा नहीं है,
    तन्हा किया ख़ुद को मैंने इतना कि,
    छिप के रोने का कोई कूचा नहीं है।
    मेरे नसीब में तो तू नहीं, बस इतना सा रहम कर दे,
    झूठा ही सही मगर एक रात ख़्वाब में आ, वफ़ा-ए-वहम कर दे।
    ©msr_prose