• bhavyagogia 33w

    तू मिल जाएगा इस आस मैं कान्हा, पग पग आगे बढ़ाती हूँ
    हस्ती हूँ, रोती हूँ, कभी गिरती लेकिन फिर सम्भल जाती हूँ
    तेरे दर के आगे रोज़ विनती कर जाती हूँ
    पल पल बस तेरा नाम दोहराती हूँ
    मन में तेरी प्यास रखे, हर ज़हर सी फब्ती का घूँट पी जाती हूँ
    पागल सी तुझे ढूंढती हर जगह और फिर कभी राह भटक जाती हूँ
    अपने आप को भूलकर, बस तुझको निहारती हूँ
    तू जो मेरी इकलौती इच्छा, हर क्षण तुझको पुकारती हूँ
    तू प्यार का सागर जो है, तेरी बूंद बूंद को तरस जाती हूँ
    तुझको अपनी मंज़िल बना कर, बस तुझमें खो जाती हूँ
    व्याकुल सी तलाशती तुझको, तेरे दर्शन को अधीर हो जाती हूँ, अधीर हो जाती हूँ

    ©bhavyagogia