• akarshita29 76w

    इन अंगारों से ,शोलों को भड़कने दोl
    खुद को तुम ,खुद की क़ैद से निकलने दो।
    कबतक यूँ बेज़ान होकर जीते जाओगे,
    कभी तो खुद की क़ाबिलियत से खुद को निखरने दो।
    तोड़ दो वो जंजीरें ,जो बांधती हो तुमको।
    छोड़ दो वो शिकायतें ,जो कभी गलतियाँ बन जातीं हों।
    किसी और के गुनाहों की सज़ा,
    कब तक दोगे यूँ सबको एक सा समझ कर।
    क्यों,
    सबकी गलतियों पर , बस तुम्हारे वादे टूटें।
    सबकी खुशियों पर , क्यों तुम्हारे ग़म बरसें।
    बहुत हुआ यूँ अतीत का लेखा -झोखा।
    कल को छोड़ ,न आगे की होड़,
    अपना आज बनाकर देखो।
    अच्छा लगेगा, सबकुछ सच्चा लगेगा।
    फिर शिकायतों की जगह ,दुवाएँ बरसेंगी।
    पछतावे की जगह सुकून होगा।
    और नफरत की जगह
    जहन में प्यार का शैलाब उमड़ेगा।।
    ©akarshita29