prerana_dr30

happy go lucky, Capricorn, fightergirl , traveller , translator , writer, poet

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  • prerana_dr30 3w

    ठूंठ

    सोचा कुछ लिखूँ
    क्या लिखूँ पता नहीं
    कलम उठाऊँ तो हाथ ना चले
    कहना चाहूँ तो लब न खुले
    वक्त बदला ,लोग बदले
    और बदले हालात
    किस्से - कहानी - किताबों में
    अब नहीं पहले जैसी बात
    खोखली इमारतों में
    खोखले परिंदे
    फड़फड़ाते पंख
    डगमगाते कदम
    काँच के चंद टुकड़े
    चुभ गए
    सह गए सब दर्द
    ख़ामोश ही रह गए
    सूखे पत्ते की तरह
    सूखे हैं हम - तुम
    गिर पड़ेंगे पेड़ से
    एक हवा के झोंके से
    कुछ नहीं रह जाएगा
    ना शाख़ ,ना जड़
    मिट्टी - मिट्टी हो जाएगी
    ठूंठ की अकड़ !!

    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 15w

    You are lucky
    If you are stuck
    At home with your own parents
    During this lockdown
    Blessed ,if you are
    Getting good food
    And sleep
    During these tough times
    Fortunate , if you are
    Breathing fresh air
    Eating homecooked food
    During the pandemic
    Advantaged, if you are
    Getting paid on time
    And haven’t lost your work
    During covid times

    Be thankful for this life
    And Grateful for today
    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 16w

    दस रुपए क़ा नोट

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    दस रुपए का नोट

    दिवाली की सफ़ाई में
    निकाला मैंने पुराना कोट
    मुड़ा- तुड़ा, घिसा- फटा
    जेब में था ‘दस रुपए का नोट’

    एक समय था जब इतने में
    मिल जाते थे पेंसिल- कटर
    स्केल ख़रीदने के बाद भी
    बच जाते थे कुछ चिल्लर

    कभी ‘जलेबी’ दस की दे दो
    कर दो पैक ‘समोसे’ दस के
    मेला-सर्कस-रामलीला
    सभी चलता भरोसे दस के

    दस रुपए में आते थे
    गाजर,मटर,टमाटर
    वॉलेट में पिताजी के रहते थे
    दस-दस के नोट भरकर

    ये ५००-२००० के नोटों ने
    सब खेल बदल डाला
    वॉलेट में नोटों की भीड़ में
    खो सा गया ‘दस का नोट’ बेचारा

    कभी करारा-ताज़ा चमकता नोट
    कैसे मुँह फुलाये बैठा है
    बटुवे की सिलाई में दुबक
    सिसक कर मुआ सा बैठा है

    ख़ैर सफ़ाई हुई कोट क़ी
    याद आई नोट की
    निकल आए क़िस्से पुराने बातों में
    फिर कोई नोट मिलेगा, धूल खाता किताबों में

    समय-समय की बात है
    कल का राजा है आज फ़क़ीर
    हमने भी कलम चलाते- चलाते
    लिख डाली काग़ज़ के चंद टुकड़ों की तक़दीर

    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 25w

    There are days I just want to be a daughter .......







    And this happens EVERYDAY!!
    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 29w

    गुज़र रही हूँ मैं

    वक़्त गुज़रता नहीं
    गुज़र रही हूँ मैं

    नदी के पानी सा कल-कल बहाव
    कनक पुष्प लताओं सा कोमल स्वभाव
    नादानियों से भरा बचपन गया कहाँ
    तालाब के पानी की तरह
    ठहर गई हूँ मैं
    वक़्त गुज़रता नहीं
    गुज़र रही हूँ मैं ।

    सरल- सुगम - सुरम्य सा
    जीवन का एक संगीत था
    धुनें बदल गईं कई
    और वाद्य भी नए- नए
    सरगम के सुरों सा क्यों
    बिखर गई हूँ मैं
    वक़्त गुज़रता नहीं
    गुज़र रही हूँ मैं ।

    कभी आँगन में खेलती
    मिट्टी की गुड़िया से
    बातें करती इधर-उधर की
    कभी आँगन में नन्ही गौरय्या सी
    नाचती फुदकती और उछलती
    आज पंख पसारती हुई
    खुद में ही सिमट गई हूँ मैं
    वक़्त गुज़रता नहीं
    गुज़र रही हूँ मैं!!!!

    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 31w

    एक वक़्त था जब लोग सौंच के बाद हाथ धोया करते थे ।
    आज सोच के बाद भी हाथ धोने पड़ रहे हैं!!

    यूँ ही ... #कलमकहानीऔरमैं
    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 35w

    #चाय #चायसेप्यार #घरपेरहो #चायपियो #Hindipoems #morningthoughts #earlymorningteabreaks #teaislove

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    चाय की तलब!

    सुबह हुई, आँखें खुलीं
    पैर बढ़े रसोई की ओर
    अदरक-इलाइची कूटे गए
    पानी खौला एक ओर ।
    आया उबाल चाय में जब
    स्वाद बना कड़क तब
    चाय का प्याला भरा गया
    अब बुझेगी शायद तलब ।
    लिया हाथों में प्याला
    अधरों से लगा डाला
    अदरक की ख़ुशबू, चीनी की मिठास ने
    आज फिर से पागल कर डाला।
    क्या ख़ाक कमाया जीवन में
    जिसने ‘चाय’ कभी पी ही नहीं
    सही मायने में देखा जाए
    बेचारे ने ज़िंदगी आज तक जी ही नहीं।।
    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 42w

    सबको जाना था दिल्ली

    काम की तलाश में
    भूख में,प्यास में
    हताश व निराश हो
    सबको जाना था दिल्ली

    पहाड़ को छोड़ पीछे
    भूलकर आँगन- बाग़ीचे
    हरे मैदानों को त्याग
    माचिस के डिब्बे जैसे
    घरों में बसने
    सबको जाना था दिल्ली

    मेहनत- मज़दूरी खेतों में
    कर लेते तो घिस जाते
    गेंहू - मक्के की खेती कर
    चक्की में ही पिस जाते
    मॉल का फ़ैशन अपनाने
    सबको जाना था दिल्ली

    बेटे की पहाड़ में है एक दुकान
    कहने में लाज सी आती थी
    दिल्ली में नौकरी करता है
    कहकर ईजा भी इतराती थी
    होटलों में भान माँजना
    ज़्यादा अच्छा लगता था
    पहाड़ की जीवनशैली से बोर हो
    सबको जाना था दिल्ली

    धुँआ- मेट्रो- शोरगुल की ऐसी हुई आदत
    आज वही शहरी टीमटाम व लाइफ़स्टाइल
    बन गए अचानक एक आफ़त
    गाँव की ज़मीन बेच कर
    सबको जाना था दिल्ली

    एक विषाणु ऐसा आया
    नाम कोरोना कहलाया
    बसों- गाड़ियों में भर-भर
    हर भगोड़ा वापस पहाड़ आया

    कहते थे जो महापुरुष
    गाँव में क्या रखा है?
    आज वही पास बनवाकर
    बनने चले हैं आत्मनिर्भर ?

    शहर का धुआँ हार गया
    गाँव की मिट्टी के आगे
    पहाड़ का बच्चा वापस आया
    ढेरों रोज़गार के अवसर जागे
    हर किसी ने पहाड़ का रुख़ किया
    जिस- जिस को जाना था दिल्ली ।

    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 43w

    मेरी सृष्टि, मेरी जननी

    मेरी सृष्टि मेरी जननी
    तू मेरे जीवन का सार
    त्याग किए, बलिदान दिए
    प्यार लुटाया अपरम्पार ।
    जन्म लेने से भी पहले
    तुझसे जुड़ गया एक नाता
    यूँ ही नहीं कहते हैं
    माँ का ऋण चुकाया नहीं जाता ।
    जीवन का पहला पाठ पढ़ाकर
    तू बन गई पहली शिक्षक
    रात -रात भर जगी रही
    तू ही थी पहली रक्षक ।
    मेरे साथ खेलती थी
    तू मेरी पहली मित्र बनी
    मन- मस्तिष्क पर छाप छोड़ दी
    जीवन के कैनवास का सबसे सुंदर चित्र बनी।
    माँ अपने शिशु के लिए न जाने क्या क्या कष्ट सहे
    जगत से जंग करें हज़ारों, पर मुँह से वह कुछ न कहे
    कभी लक्ष्मीबाई बनकर ,अंत समय तक लड़ी
    कभी सीता बनकर अग्निपरीक्षा में रही खड़ी
    माँ से मैं हूँ, तुम हो, सब हैं
    माँ मेरा ईश्वर है, रब है
    त्याग-तपस्या की मूरत है सर्वस्व है
    माँ ही है वह दिव्य रूप, जिससे मेरा वर्चस्व है ।

    डा० प्रेरणा जोशी
    😊
    ©prerana_dr30

  • prerana_dr30 43w

    एक वीर की माँ

    सीने में रखकर चट्टान कोई
    जाने उस माँ ने क्या सोचा था ,
    अपने जिगर के टुकड़े को
    दूर सरहद पर जब भेजा था ।

    हर बार यही पूछा करती
    नम आँखों, काँपती आवाज़ में
    कैसा है तू ,कब छुट्टी पर घर आएगा
    दिवाली पर साथ होगा या वहीं दिए जलाएगा?

    हर बार यही कहता ‘अच्छा हूँ माँ
    बस जल्दी छुट्टी आऊँगा
    घर पर ही दिए जलाएँगे
    तुझको नई साड़ी भी दिलाऊँगा ‘

    कैसी कठिन परीक्षा है
    फँस गया हूँ किस जाल में ?
    एक माँ बुलाती है घर पर
    दूसरी की रक्षा करनी है हर हाल में ।

    लौटा रही हूँ तुझको लाल तेरा
    तिरंगे में लिपटा हुआ ,
    तू जान ले,मेरी रक्षा करते करते
    वह अंत समय तक डटा रहा ।

    मेरा लाल कब था मेरा ?
    वह तो घर पर भी तेरी बातें करता था,
    चार दिन छुट्टी पर आता
    फिर जाने की ज़िद करता था ।

    दोनों माँ एक दूसरे से
    बहस- प्रश्न करती रहीं
    पुत्र था वह किसका
    इसी पर लड़ती रहीं ।

    आज दोनों की आँखें नम हैं
    दोनों के हृदय में बेटे के जाने का ग़म है ,
    एक से जन्म लिया,दूसरी के लिए क़ुर्बान हुआ
    वीर के साथ,माँ की ममता का बलिदान हुआ।


    ©prerana_dr30