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  • roothi_kalam 17h

    एक ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है ��

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    ग़ज़ल

    कभी तिरी ग़ज़ल बनूँ ,कभी मिरा ख़याल हो
    जिसे लिपट के रो सकूँ फ़क़त तिरा रुमाल हो

    मकान जो जहान था, बसी जहाँ मिठास थी
    धुआँ हुआ घुटन बढ़ी कि झाँकना मुहाल हो

    जवाब हम-नवा मिरे यूँ दूर ना तलाश कर
    जहाँ रखा है आसमाँ , रखा वहीं सवाल हो

    मसल दिया यहीं कहीं जिसे हरे गुलाब सा
    नहीं तिरी निगाह पाक , क़ैद क्यों जमाल हो

    पढ़े लिखे हैं लोग सब, पढ़ी लिखी है शायरी
    सुना नहीं कभी कहीं कि पढ़ के भी वबाल हो

    जहाँ बुझा है हौसला बसी जहाँ है मुफ़लिसी
    छुपा जहाँ पखाल हो वहाँ फ़कत मलाल हो

    लहू 'हिया' है रो पड़ी कि सुर्ख लब हुए कँवल
    जिसे सभी उड़ा रहे, कहीं वही गुलाल हो
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 4d

    Bas Yun hi......

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    शब में और सहर कुछ और होता है
    एक ही शख़्स कितने नक़ाब ढ़ोता है
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 4d

    Bas Yun hi....
    .


    Just got notification after posting it....it's my 500th post...��
    Socha tha kuch acha likhungi , par ye bhi bas Yun hi ho gya....khair....

    .

    #500thpost #roothi #sher

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    नाम से पढ़ते हैं पढ़ने वाले
    'हिया' शे'र बड़ा ना लिखा करो
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 5d

    एक ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है ��
    .
    बह्र-ए-मुतकारिब मुसम्मन सालिम

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    ग़ज़ल

    तड़प बर्फ़ में यूं जली थी चमेली
    बहुत दूर पैदल चली थी चमेली

    हरे घाव रिसने लगे थे बदन से
    बड़े नाज़ से ही पली थी चमेली

    कहा जिस्म उसका फ़क़त मैला सब ने
    सिरों खूब, सब ने मली थी चमेली

    शकर लब, जबां मखमली, नैन प्याले
    मिरी रेशमी सी कली थी चमेली

    रहे कोसते वो तुझे आख़िरी पल
    तिरे बाद बोले , भली थी चमेली

    घुटन थी बड़ी आसमां भी नदारद
    हुई दफ़न क्यों उस गली थी चमेली

    'हिया' भी तरस थी गई ओढ़ने को
    मिरे रंग में ही ढली थी चमेली
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 1w

    एक मेहंदी के पेड़ से हाथ तक का सफ़र बयां किया है, पसंद आए तो जरूर बताएं������


    रविसुता - युवती
    लव-अल्प मात्रा
    कुंतल- बाल
    कुन्दन- सोना
    सौदामिनी- बिजली
    सुरभी - हिरण
    शशिप्रभा - मोती
    अंबु /मेघपुष्प - पानी
    बयार - हवा


    #mehndi #roothi #heena #hindikavita #hks #hindiwritings

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    मेहंदी 'हिना ' हुई

    कोपलों सी खिल रही थी
    राग- अलाप से मिल रही थी
    कभी पंछी सहलाते थे,
    कभी बादल नहलाते थे
    वो ये सोच मुरझा गई
    थोड़ा रोयी फिर सकुचा गई।

    एक हाथ आया उसे लेने
    इक हाथ के लिए...
    रविसुता रचाना चाहती थी
    जिसे अपने नाथ के लिए..

    उन कोपलों से पृथक पल्लव हुए
    अश्रु थे जो सारे वो मानो लव हुए
    कुंतल घसीटे गए ऐसे
    सौदामिनी बरसी जैसे
    हिना को पीसा जाने लगा....
    फ़िर,
    मेघपुष्प से मिलन हुआ,
    थोड़ा अकुचाई ,थोड़ा लज्जाई
    फिर घुल उसमें कुन्दन हुई

    किसी का हाथ संवारने को
    किसी का भाग्य निखारने को
    वो केसरी उत्साह लिए
    वो मखमली एहसास लिए
    वो सुरभी कुंडलित अमृत जैसे
    शशिप्रभा हो सीपिज जैसे
    जैसे हो धरा सांझ ओढ़े
    वो ख़ुद में अंबु निचोड़े

    इक सुंदरी का गहना हुई....
    आज मेहंदी हिना हुई!

    उपवन से बयार संग जो आ चली थी
    वो आज कर की शोभा हो चली है
    वो बसंती रंग हाथों में छूट जाता है....
    शायद तभी, मेहंदी का दिल टूट जाता है।

    यही सोच....
    मेहंदी अपने हाल पर रो देती है
    जब वो लड़की हाथ धो देती है।
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 1w

    एक ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है ��
    .
    मीटर - 2212 2212 2212 2212

    रज़ज़ मुसम्मन सालिम

    ९-०६-०१९
    ___________________________________________________

    रम्ज़ - secret



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    ग़ज़ल

    बस इक बची है वो हरी सी कील जब दीवार में
    होगा बचा क्या रम्ज़ कोई ख़ाक अब दीवार में

    शब को चला था ओढ़ने ,मैं हाथ थी बस रौशनी
    जाने दुबक के छिप गया महताब कब दीवार में

    पहली नज़र का मखमली एहसास वो कैसे कहूं
    गुम ही गए वो दर्द मेरे आज सब दीवार में

    वो आसमां था कुछ गुलाबी शबनमी थी आरजू
    मैं रह गया ख़ामोश, देखे सुर्ख लब दीवार में

    थे राज़ गहरे कहकशां के छिप गए सागर तले
    अरमां मिरे आख़िर हुए क्यों कैद सब दीवार में
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 2w

    सोचा था होगा वो मेरे आंगन का ही तारा
    था वो इक चांद किसी और का प्यारा
    बेबाकी थी बातों में और मासूम था चेहरा
    वो चांद था शबनम लिए , था रात का पहरा

    मेरी मुफ़लिसी की कुछ तो तुम भी दाद दो यारो
    इश्क़ होने ही से पहले छिन गया यारो
    हैं धड़कनें ये काटती मेरे ज़ख़्म सीने के,
    हो गए यूंही सैकड़ों फ़िर घाव भी यारो

    दर्द सारे दुनिया जहां के समेट वो ख़ुद में
    था वो पाक गंगा सा , सो धुल गया यारो
    मेरी ज़िन्दगी थी इक कड़वा प्याला शहद का
    थोड़ी ही सही , शकर घोल गया यारो

    अब कुछ और ना कहना हमें, ना सोचना यारो
    पन्ने पलट मेरी ज़िन्दगी के वो उड़ गया यारो
    कुछ सिलवटें हैं जो जाते जाते ही जायेंगी,
    उस चांद को तकते ही अब शब ढल जाएगी

    वो चांद है किसी और का.....
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 2w

    आंसूओं का पुल बना , दर्द की स्याही से कलम- ए - इश्क सींची है,
    मैं वो लड़की हूं जिसने रात दिन एक कर सिर्फ़ तेरी तस्वीर खींची है।
    ___________________________________________________


    किसी को आहत करने का कोई उद्देश्य नहीं है, हम ख़ुद आहत हैं।��

    जिस तरह नींबू के रस की एक बूंद दूध को फ़ाड़ देती है , वैसे ही कुछ कड़वी बातें पूरे रिश्ते को कसैला कर देती हैं। हम जाने अनजाने अपने करीबी लोगों की तुलना किसी और से कर उनका दिल दुःखा देते हैं।
    हमें याद रखना चाहिए कि हर कोई अपने आप में पूर्ण है।

    अंगबीन - Honey
    ज़हीन intelligent
    तार-ए-निगह - निगाहों के तीर
    बर्ग-ए-गुल - फूल की पंखुड़ी
    मतीन - गंभीर
    फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ - Autumn season
    मौसम-ए-गुल - spring season
    ग़ुल - a flower

    #roothi #hindiwriters #hindiurduwriters #hks #shayri #kavita #love #hate


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    तुम कहते हो

    माना दूध में घुली सफ़ेदी मेरे अंग नहीं
    सांवली हूं तो क्या ! क्या ये रंग नहीं!

    कहते हो! के वो जैसे अंगबीन थी
    सुर्ख़ लब थे और सूरत हसीन थी
    बड़े रुतबे वाली थी वो, ज़हीन थी
    मैं मानती हूं, वो शायद मतीन थी

    ख़ुद ग़ुल थी या नाज़ुक जैसे बर्ग-ए-गुल!
    फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ थी या फिर मौसम-ए-गुल ?
    जिसकी तार-ए-निगह से हो गए ढेर कितने ,
    रेशमी जुल्फें उसकी, थी वो हूबहू बुलबुल!!

    जाना! मैं जानती हूं और समझती भी हूं,
    के वो जो भी थी, तिरे दिल के करीब थी!

    मगर ये कहना के मैं अंगबीन नहीं, मतीन नहीं,ज़हीन नहीं
    मैं तिरी आख़िरी मोहब्बत तो हूं! पर मैं उतनी हसीन नहीं
    गलत तो नहीं पर ...
    सही भी तो नहीं!!

    क्यों किए वो सारे ! वादे एक हज़ार
    जब टूटे पड़े हैं , तेरे मेरे सारे तार!
    पुरानी यादों के बक्से को लिए घूम रहे हो
    फिर बोलो ना क्यों मेरा माथा चूम रहे हो!

    आंसूओं का पुल बना , दर्द की स्याही से कलम- ए - इश्क सींची है,
    मैं वो लड़की हूं जिसने रात दिन एक कर सिर्फ़ तेरी तस्वीर खींची है।
    इस रूह- ए - पाक को तुम छू ना सके शायद,
    जाना! तुम हो के भी ' मेरे ' हो ना सके शायद!!
    शायद तुम्हें फ़िर किसी हसीन की तलाश थी
    और हम आंखों में आंसू भर रो ना सके शायद!
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 2w

    I'M RESPONSIBLE

    (must read the caption)
    ___________________

    There is no denying that our earth is facing numerous changes in the current times.
    Water crisis, Overpopulation,Soil degradation,Species extinction ,Deforestation and much more...

    Unfortunately, there's now too much carbon in the air. Burning of fossil fuels, deforestation for agriculture, and industrial activities have pushed up atmospheric CO2 concentrations from 280 parts per million (ppm) 200 years ago, to about 400 ppm today. That's an unprecedented rise, in both size and speed.

    And I don't know why people are excited for 5G , dude! do you want shorter lifespan with high speed internet ?
    Mmm..let me explain...
    All cell towers emit Radio Frequency (RF) Radiation. This is what makes them dangerous.
    1G, 2G, 3G and 4G use between 1 to 5 gigahertz frequency. 5G uses between 24 to 90 gigahertz frequency. the higher the frequency the more dangerous it is to living organisms.

    LET ME TELL U HOW??

    (While 4G’s wavelengths travel along the surface of the skin, 5G’s millimeter waves are more insidious. When 5G wavelengths are emitted, our skin will automatically absorb them, which will naturally cause the skin to rise in temperature.)


    ( हर तरह से आज हमारी पृथ्वी दूषित हो रही है , पानी की ही समस्या देख लीजिए, अभी मुझे मेरे एक south Indian मित्र से पता लगा कि पानी से बहुत से रोग हो रहे हैं वहां और toxic हो गया है पानी।

    इसी प्रकार अब internet
    को और तेज़ बनाने के लिए 5G लाने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है, पर वो 20 ya 30x speed किस काम की जो हमें ही आहत करे।

    जरूर सोचिएगा और इस पोस्ट को share करिए, साथ ही मैं चाहती हूं कि हम सब मिल कर अपने स्तर पर कुछ ना कुछ करें।
    हमारी कलम की ताकत का सही इस्तेमाल करें और अपने घर को बचाए इससे पहले कि हालात और बिगड़ जाएं।

    और एक बात और, इन सब के लिए हम ही ज़िम्मेदार हैं।



    #iamresponsible
    #hindiwritings #hks #roothi #love #kavita #sher #nazm #shayri


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    I'm responsible

    तेरे लंबे हरे मुलायम बाल
    जो अब धधक रहे हैं , झुलस रहे हैं...

    तेरी ये मैली कुचैली साड़ी, जो कभी रेशमी तारों जड़ी थी
    जो कभी फ़ूल- कलियों में रंगी थी,
    पंछी जिसके आंचल में खेला करते थे ..
    और बच्चे अमिया की डाल पर झूला करते थे..
    हां! उसी चमकती रेशमी साड़ी को काला करने के लिए,
    उसे प्लास्टिक से ढकने के लिए....
    मैं ज़िम्मेदार हूं!

    तेरे सुनहरे , काले, नीले और स्वेत अब्र
    जो अब आसमां से लापता हैं...
    उन्हें अगवा करने के लिए
    मैं ज़िम्मेदार हूं

    तेरे बदन की मिट्टी, जिसकी मनमोहक महक
    बरसात को खुशनुमा बनाती थी...
    उस मिट्टी की मिलावट के लिए...
    हां! मैं ज़िम्मेदार हूं!

    वो तेरी लटों से उलझे झरने ,
    दामन से लिपटे दरिया
    और तेरी आंखों के समंदर
    गहरे, नीले और शांत....
    इनमें विश घोलने के लिए
    सिर्फ़ ! मैं ज़िम्मेदार हूं।

    तेरे सुर्ख़ लबों से लाली चुराने के लिए
    तेरी काली आंखों के सुरमे को फैलने के लिए
    तेरे जिस्म पर बार बार कुल्हाड़ी चलाने के लिए
    तेरे उन मासूम बच्चों को बेघर बनाने के लिए
    मैं ज़िम्मेदार हूं!
    हां! सिर्फ और सिर्फ मैं
    ©roothi_kalam

  • roothi_kalam 3w

    मीटर - 2222/1222/22

    एक ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है, कोई कमी रह गई हो तो बताइएगा।

    शज़र - tree
    क़मर - moon
    दीवार - ए - ज़िंदाँ - wall of prison




    #hindiwritings #hks #roothi #love #kavita #sher #nazm #shayri


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    ☘️☘️

    टूटा देखो शज़र , यूं सावन में
    मैं जाऊंगी बिखर ,यूं सावन में

    चांदी जैसी चमक था जो ओढ़े
    फ़ीका क्यों है क़मर यूं सावन में

    क्यों मैं दीवार लांघूं जान-ए-जां
    ना सीखा ये हुनर यूं सावन में

    भीगे थे रात जो कल शबनम में
    क्यों अब सूखे अधर यूं सावन में

    यारो थी स्याह सी आंखें उनकी
    जाएं कैसे मुकर यूं सावन में
    ©roothi_kalam