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  • roothi_qalam 9w

    चाँद पूछे चाँदनी से
    क्यों बिखरती हो प्रिये
    चाँदनी धीमे से बोली
    आपकी ख़ातिर प्रिये

    रौशनी जब रात सारी
    आँख की थी मर गई
    दिल में बैठा एक शोला
    आग बन कहने लगा
    मैं जलूँगा रात सारी
    आपकी ख़ातिर प्रिये

    उम्र भर का प्यार माँगा
    टूटी इक दीवार ने
    और घर फिर ढह गया
    रो रो के ये कहते हुए
    आपकी ख़ातिर प्रिये
    आपकी ख़ातिर प्रिये

    कुछ लकीरें बन रही हैं
    हाथ में अब प्रेम की
    सब पे लिक्खी बात है ये
    आपकी ख़ातिर प्रिये

    सैकड़ों हैं गीत लिखने
    मुझको अपनी प्रीत के
    स्याह होती रात लिखूँ
    धानी धानी दोपहर
    कुछ पहाड़ों की वो ठंडी
    गुदगुदाती शाम भी
    जिनका ये उनवान होगा
    'आपकी ख़ातिर प्रिये'
    आपकी ख़ातिर प्रिये

    ©हेमा काण्डपाल 'हिया'

  • roothi_qalam 13w

    .

  • roothi_qalam 15w

    ��एक ग़ज़ल��
    .
    हाई फाई लोग हुए अब , किसको सुनना है सादा
    यार 'हिया' लिक्खो कुछ ऐसा ,जो थोड़ा ख़म-चम लागे
    .

    निस्फ़ - अर्द्ध, आधा
    मुबहम - धुंधला
    आहू- हिरण
    गाम - क़दम
    ज़ैग़म - Lion
    गुल- रू - फूल जैसे चेहरे वाली
    ख़म-चम stylish

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    .





    ©roothi_qalam 'Hiya'

  • roothi_qalam 23w

    ( बे-कसाँ- Helpless)
    (राह-दाँ- Guide)
    मुसव्विर painter
    (मिज़्गाँ- eyelashes)
    (ख़स्ता-मिज़ाजी- delicate mood )
    (राएगाँ useless )

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    ग़ज़ल

    किसी भी शख़्स पर कब मेहरबाँ थे हम
    ये था इल्ज़ाम के कुछ बद-गुमाँ थे हम

    न लिक्खी ही गई आहें न काम-ए-दिल
    तभी जाना के कितने बे-कसाँ थे हम

    तुम्हें भी राह से भटका दिया हमने
    अजी छोड़ो कभी तो राह-दाँ थे हम

    वो चलता साथ भी तो कब तलक चलता
    वो क़िस्सा और लम्बी दास्ताँ थे हम

    गो मिज़्गाँ में रहे अटके मगर फिर भी
    तिरी आँखों में चुभती किर्चियाँ थे हम

    मिरी ख़स्ता-मिज़ाजी पर न जाना तुम
    है ये मालूम तुमको बद-ज़बाँ थे हम

    धरा उजली, शफ़क़ में नूर था जिससे
    गगन पर आज किश्त-ए-ज़ाफ़राँ थे हम

    सभी कहते सुख़नवर हो बड़े लेकिन
    'हिया' कुछ थे तो बस अब राएगाँ थे हम
    ©roothi_qalam'हिया'

  • roothi_qalam 26w

    एक ग़ज़ल बह्र ए मीर (२६ मात्रिक )

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    ग़ज़ल

    कोरे अंबर पर तारों से लिक्खी हुई लड़की
    गुम-गश्ता* बादल की ओट में रक्खी हुई लड़की

    (गुम-गश्ता- lost)

    उलझे उलझे ही रहते थे वो गेसू यारो
    सुलझाती भी कैसे ख़ुद में उलझी हुई लड़की

    ज़िल्लत में काटी थी जिसने ख़्वाबों की राहें
    मेरे अरमानों का पंखा झलती हुई लड़की

    कुल्फ़त* की वो चूनर ओढ़े बैठी आँगन में
    शायद है इक उल्फ़त में हारी हुई लड़की

    (कुल्फ़त - dukh )

    कल देखी एल्बम में मैंने यादें बचपन की
    कितनी प्यारी लगती थी वो हँसती हुई लड़की

    शायद मेरी ग़ज़लों में वो तुमको मिल जाए
    ढूँढ रही हूँ मैं अंदर की खोई हुई लड़की

    माँ कहती हैं छोड़ दो लिखना बेटा ये ग़ज़लें
    और करेगी भी क्या फिर ये बहकी हुई लड़की

    दीदा-वर* हैं पढ़ने वाले लोग "हिया" तुमको
    वो कहते हैं तुम हो अदब में रंगी हुई लड़की

    (दीदा-वर-पारखी)
    ©roothi_qalam" Hiya"

  • roothi_qalam 28w

    ग़ज़ल

    हाथ छुड़ा कर जाने की तुमको कितनी जल्दी थी
    सारी दुनिया पाने की तुमको कितनी जल्दी थी

    इसमें जुज़ तनहाई के हमको क्या कुछ मिलना था
    ख़ामोशी घर लाने की तुमको कितनी जल्दी थी

    पार न ऐसे करनी थी काजल की लक्ष्मण रेखा
    अश्कों बाहर आने की तुमको कितनी जल्दी थी

    ग़ज़लें इरफ़ाँ होनी थी मेरी इन नम आँखों से
    काग़ज़ ग़म पी जाने की तुमको कितनी जल्दी थी

    यार रगों को मेरी तो घुट्टी पीनी थी गाढ़ी
    ख़ूँ में अश्क़ मिलाने की तुमको कितनी जल्दी थी

    इश्क़ "हिया" भरपूर किया तुमने भी इक शायर से
    यूँ तन्हा हो जाने की तुमको कितनी जल्दी थी
    ©roothi_qalam

  • roothi_qalam 32w

    ग़ज़ल

    भाग सँवारा जा सकता था
    हम को मारा जा सकता था

    इक बूढ़े दरिया तक चल कर
    आज किनारा जा सकता था

    उनसे मिलने की ख़ातिर तो
    सब कुछ वारा जा सकता था

    छोड़ के जाने वाले तेरा
    नाम पुकारा जा सकता था

    जो रिश्ता मरने वाला था
    जल्दी मारा जा सकता था

    उसकी आँखें पढ़कर भी तो
    वक़्त गुज़ारा जा सकता था

    ला-या'नी से मिसरों को भी
    ख़ूब सँवारा जा सकता था

    यार "हिया" ग़ज़लों में थोड़ा
    ख़ुद को उतारा जा सकता था
    ©Hema kandpal "हिया"

  • roothi_qalam 38w

    ख़ुद-निगर- selfish
    उक़ूबत- यातना
    सादिक़- faithful/ honest

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    शिथिल पड़ा गीत
    रुआँसी नज़्म
    इक उधड़ी हुई ग़ज़ल
    दो दिशाविहीन मिसरे
    घेरे हुए थे मुझे
    और
    रगों में भरा जा रहा था
    छंद रूपी नवजीवन

    उस अस्पताल के बिस्तर पर,
    मैंने सात बूँद आँसू टपका दिए
    जिनसे जन्म लिया - यगण , मगण ,
    तगण , रगण , जगण , भगण ,
    नगण और सगण ने
    आठवीं बूँद में लहू था ....
    दुत्कारा गया...
    झिड़का हुआ..
    नक़्क़ाद जो था ।

    उस रात पलकों के घर जन्मा
    एक तसव्वुर ...
    मगर अफ़सोस!
    उसे उक़ूबत में रहना था ,
    जिसका दिमाग़ जकड़ा था
    बहुत से नियमों से...

    सादिक़ रगें बस सोख रहीं थीं
    उस तसव्वुर की महक ...
    और फिर
    छंद हृदय तक न जा सका...

    सोचती हूँ अगर ये रगें वफ़ादार न होती?
    अगर ये नियम ज़हन को खा जाते
    तो मेरे पास क्या बचता?
    एक ग़ज़ल? एक उम्दा नज़्म?
    एक गीत ?
    या बस एक
    ख़ुद-निगर हिया!
    ©roothi_qalam

  • roothi_qalam 38w

    एहतिमाम - arrangement /management
    शमीम-ए-ख़याल- fregranace of thought
    सबा- hwa
    ख़ुद-निगर- selfish
    उक़ूबत- यातना
    जुम्बिश - vibration
    ज़ात-ओ-ज़िंदगी - self n life
    इश्तिहा - desire /hunger
    बत्न-ए-सुख़न- womb of poetry
    . .

    #nazm #urduhindi

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    वही ज़िन्दगी थी

    घुप अंधेरी रात और पैरों में बेड़ियाँ
    उक़ूबत में उलझी थी ज़ात-ओ-ज़िंदगी
    इक जुम्बिश सी हुई थी सीने के पास
    छेड़ा था किसने ये साज़-ए-ज़िन्दगी
    इक पतंग को लिक्खा था तक़दीर जो मेरी
    मैंने पतंग ही बना ली एहतिमाम-ए-ज़िंदगी

    डोर थी उसकी हाथों में जिसके
    वो हाथ थे मेरे या थोड़े थे उसके
    कहकशाँ छूने को
    सबा से मिलने को
    मैं उड़ती रही
    मैं घुलती रही
    रात को उगती और सारा दिन
    मैं अमावस सी ढलती रही
    मैं उस इक डोर से लिपटी रही

    आए फिर बहार के दिन
    गुलमोहर खिलने लगे
    आसमाँ दूधिया हो गया
    और ख़्वाब ख़ुद-निगर होने लगे

    मेहंदी की पत्तियाँ सिलबट्टे पर थिरकती रहीं
    मुझे सुर्ख़ होना था
    मुझे आसमाँ छूना था
    इक बीज था बोया इश्तिहा ने मेरे
    शमीम-ए-ख़याल वो काग़ज़ था ओढ़े
    ख़ुद-निगर कलम बस ज़रिया बन रही थी
    बत्न-ए-सुख़न में शायरी पल रही थी

    ए-डोर मुझे अब आज़ाद कर दे
    ख़्वाबों को मेरे शब-ज़ाद कर दे
    ये कह कर जो झटकी पैरों की बेड़ी
    टूटी थी उस दिन सब रिश्तों की डोरी

    गई थोड़ा ऊपर ज़माने से आगे
    गिरी औंधे मुँह थी, मैं फिर ज़मीं पर
    न डोरी थी कोई, न थी कोई बंदिश
    न साथी था कोई, न थी कोई रंजिश
    न दरिया था मेरा, नहीं कहकशाँ ही

    हँसी जोर से फिर वो मिट्टी की गुड़िया
    ज़मीं से उठाकर मुझको वो बोली
    वो डोरी थी सीढ़ी, वो डोरी थी मंज़िल
    जिसमें लिपट कर के तू उड़ रही थी
    वो डोरी नहीं ! वो ही ज़िन्दगी थी
    ©हेमा कांडपाल "हिया"

    ©roothi_qalam

  • roothi_qalam 43w

    सबसे पहले जहां से शुरुआत की थी उस प्लेटफॉर्म को धन्यवाद् ������
    आप सभी मेरे साथ उम्र भर रहें यही आशा करते हैं। आप लोग को मैं पहले भी कह चुकी हूं कि mirakee एक फैमिली है मेरे लिए और आप सब परिवार वाले।
    आज रेख़्ता तक का सफ़र हो पाया है तो उसमें आप सब की हौसला अफजाई ही है।
    वो लड़की जो कुछ भी "बस यूं ही" के नाम से पोस्ट कर देती थी और आप लोग बोलते थे, बस यूं ही भी कमाल कर दिया। पीछे मुड़ के देखती हूं तो पता लगता है कि बहुत कुछ सीखा है ख़ुद की गलतियों से। आप लोग न होते तो मैं ....
    आज नहीं समझ आ रहा क्या कहूं।

    Kuch log Jo sath Hain ab bhi......������


    @birajv @brokeninfinity @manik_sadh @naushadtm @odysseus

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