santoshmaddhesia34

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  • santoshmaddhesia34 14w

    #मान की बात

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    खुदा

    कभी बहुत कुछ दे कर रहीस बना दिया
    कभी सब कुछ लेकर फकीर बना दिया
    आजमाते हो दोनों तरफ से
    कभी देकर तो कभी लेकर
    उलटफेर करना ही तो तुम्हारा काम है
    इधर का उधर, उधर का इधर
    खुब चलता है सिक्का तेरा दोनो तरफ
    बराबर तो कभी किया नही
    छोटे और बडे़ सभी यहाँ तेरी रहमत पर
    रहम पर अपनी एक एक किरदार खडा़ किया
    नाव में बैठने वाला भी है,पार उतरने वाला भी है
    सबकी नैया को पार तुमने लगा दिया
    मन बचन और कर्म से जो सच्चा है
    उसे कहाँ से कहाँ पहुचा दिया
    डुबते वही है जिनकी नियत मे खोट होती है
    तुमने तो अंधे लगडे़ बहरे गुंगे को भी पार लगा दिया
    काम है तुम्हारा पार लगाने का नाम
    जिसने जैसा चाहा वैसा ही पाया
    भेदभाव ही नही कोई,
    रात और दिन का एहसास एक जैसा
    सूरज का प्रकाश एक जैसा
    पवन के झकोरे मंद मंद चहू ओर चले
    बारिश की रिमझीम सबपर समान रुप से पडे़
    जिसने जैसा किया कर्म का फल है दिया
    कभी बहुत कुछ देकर रहिस बना दिया
    कभी सब कुछ लेकर फकिर बना दिया
    फर्स से लेकर अर्श सारा उलट फेर तेरा ही तो है
    धनिराम नाम से धनि उसे भी निर्धन बना दिया
    दुःखीओ के दुःख दुर करने वाले मेरे राम
    दुःखीराम के जीवन को अन्नत प्रकाश से रोशन कर दिया
    अपने ही कर्मो का फल है जीवन
    जो जैसी करता है देर से ही सही वही भरता है
    तुमने तो केवल सबके कर्मो का फल है दिया
    कभी सपनो से भी उच्चा कभी हकिकत से भी निचा
    देना बहुत कुछ और लेना सबकुछ
    कभी सब कुछ लेकर फकिर बना दिया
    कभी बहुत कुछ देकर रहिस बना दिया ।।
    ©santoshmaddhesia34

  • santoshmaddhesia34 14w

    अच्छा लगता है

    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है
    मुझसे बिना पूछे मेरे सामानों को अपना बनाता
    अच्छा लगता है मुझको जब कोई मेरा अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है
    अब तक तो जितने अपने थे सब पराये थे
    हमने भी खुब गुस्ताखी की अपने ही ऊपर
    न ही कोई चलता साथ है सदा
    हमने तो रेत के महल बनाये थे
    अच्छा लगता है मुझको
    जब इस रेत को कोई महकाता है
    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है,
    ,,,,,,,
    दया क्षमा करुणा का भाव निज जेहन में
    भर कर लाता है
    दुःखी हो यदि कोई उसे भी गले लगाता है
    भुखा जो हो कोई भोजन उसे कराता है
    कभी कभी औरों के सुख के खातिर
    दुःख खुब उठाता है
    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    ऐसा एहसास जगाता है
    सुबहा की पहली किरण खुद बन जाता है
    हो मौसम धुंधला भी फर्क नहीं पड़ता
    वो साथी जब साथ निभाता है
    दुनिया के सारे सुख फिके हो जाते हैं
    जब बचपन का वो साथी याद आता है
    जी करता है पास बिठा लूं उसको
    कुछ पल के लिए
    पर वो बचपन वाला समय कहा वापस आता है
    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है
    ,,,,,
    कल्पना के पंखों पर ये मन सवार हो जाता है
    वो सारे खिलौने मिट्टी के बाहर लाता है
    फिर वही मिट्टी का महल तैयार हो जाता है
    चारों तरफ के जगलो को निहार कर
    अति प्रसन्नता को पाता है
    आज के भागदौड़ भरी जिंदगी में
    कहां वो सुख रास आता है
    न जाने कहां हो तुम सबके सब
    हिचकी मेरी तेरे याद करने से आता है
    हैरान तन मन अपने ही आप हो जाता है
    अब तो जो अपना कहते हैं
    वो स्वार्थ का बंधन है
    छुट जाते हैं सभी जब उनका पुरा हो जाता है
    कैसी रीति जगत की कभी जो सम्मान देता है
    बदनाम भी बही खुब करता है
    अब कहां कोई अपना बन पाता है
    अच्छा लगता है मुझको जब मेरा कोई अपना
    अपनेपन का अधिकार दिखाता है
    अनमोल हो जाता है वो मेरे लिए
    जो निस्वार्थ भाव से प्रेम लुटाता है ।।
    ©santoshmaddhesia34

  • santoshmaddhesia34 14w

    #अमीर#गरीब#वास्तविकता#कविता#जिंदगी

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    अमीरी गरीबी
    ©santoshmaddhesia34


    मेरे फटे पुराने कपड़ों से शर्म आती है तुम्हें
    अपने सड़े गले विचारों से कब शर्माओं गे
    तिनका-तिनका मेरी मेहनत का फल है
    कब तुम अपना पसिना बहाओगे
    गरिब के सपनों की सिसकियां यहां सुनता कौन है
    उनके आंखों के मोती यहां बुनता कौन है
    छुट जाता है सब कुछ टूट जाता है सब कुछ जो
    गरिब होता है
    टूटे हुये सपने के पिटारे लेकर जीवन को पार लगाता है
    टूटी-फूटी झोपड़ी में रहकर,
    दुसरे का महल बनाया है
    बच्चे उसके धोनी भात पर जीते हैं
    बासमती चावल खेतों में वही उगाता है
    खेतों से आती महक उसमें शामिल हो जाती है
    पर बासमती उसके घर में कहां पक पाता है
    मेरे गरिबी पर कब शर्माओं गे
    मेरे फटे पुराने कपड़ों से शर्म आती है तुम्हें
    अपने सड़े गले विचारों से कब शर्माओं गे
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    शायद गरिब के कर्मों का फल है सब कुछ
    कर्म का खोट जीवन पर चोट करता है
    पर थोड़ा समय जरुर लगता है
    अपने कर्मों के मालिक हो तुम
    झुठी शान कब तक चलाओगे
    दया क्षमा का भाव कहां तुममें
    करुणा कब बरसाओगे
    जाना है खाली हाथ जग से
    क्या हिरे मोती लेकर जाओगे
    चल कपट को छोड़ दें बन्दे
    देर हुयी तो बहुत पछताओगे
    मेरे फटे पुराने कपड़ों से शर्म आती है तुम्हें
    अपने सड़े गले विचारों से कब शर्माओं गे
    ,,,,,,,,,,,
    पांव अभागे हमारे न जाने कहां जाकर ठहरेंगे
    मेहनत के पुन्य हमें कब मिलेंगे
    बच्चों के सपनों में रंग कब भरेंगे
    पेट के भुख कब मिटेंगे
    हमें नहीं शिकवा तुम्हारे महलों से
    हे ऊंचे ऊंचे महलों वालों खुश रहो तुम सदा उसमें
    धन दौलत बैभव सदा भरा हो जिसमें
    निकल पड़े हम दो जुन के रोटी के लिए घर से
    पांव अभागे हमारे न जाने कहां जाकर ठहरेंगे
    हमारे भी दिन कब बहुरेंगे
    हमारे भी गोधुली में चांद कब बहुरेंगे
    गरिब इंसान हूं हसीन सपने देख ना
    बस की बात कहां मेरे
    मेरे परिश्रम जो है वही मिल जाये
    अपने जीवन की नैया पार लगा लेंगे
    लज्जा का दामन जो तेरा जग जाये
    काम सब गरिबों का बन जाये
    न तुम्हें मेरे फटे पुराने कपड़ों से शर्म कभी आये
    अपने सड़े गले विचारों को त्यागो
    काम गरिब का बन जाये
    काम गरिबों का बन जाये ।।