sensitive_observer

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  • sensitive_observer 4w

    देश नही, समाज नही,
    न सरकार सुधरने पाएगी।
    जहाँ जनता जाहिल हो
    फिर तो वहाँ
    व्यवस्था सब ढह जायेगी।
    इसीलिए बदलाव को लेकर
    मैं अभी निराशावादी हूँ।
    विकास के चोंचले सुनने का,
    अब कई समय से आदि हूँ।
    जो शिक्षित हैं
    वे लड़ेंगे हक़ से,
    शेष अभी भी
    जूझते हैं।
    चुपचाप ही सब कुछ सहते हैं,
    कुछ भी नहीं पूछते हैं।
    शिक्षा की हालत देखते ही
    सारी उम्मीदें मिट जाती हैं।
    जहाँ भिखारी के बच्चे भीख मांगते,
    वेश्या की बेटी बिक जाती है।

    ©sensitive_observer

    #poverty #childlabour #humantrafficking #hindipoem #kavita #mirakee

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  • sensitive_observer 4w

    “In a 2005 commencement speech at Stanford University, Jobs stated that during this period, he slept on the floor in friends' dorm rooms, returned Coke bottles for food money and got weekly free meals at the local Hare Krishna temple. In that same speech, Jobs said: If I had never dropped in on that single calligraphy course in college, the Mac...”

    Mother changed the channel. There was a documentary broadcasting on the life of Steve Jobs and how he established Apple Inc. Sneha got irritated.

    “Ma, change the channel back.”

    Mother raised the volume. Her favorite tv-serial has just started. Preeta was getting married for the fourth time in this episode and it was really very scene for mother.

    She silenced her by saying, “You are told not to touch the remote after 7, aren't you?”

    Sneha reminded the words Sir Paras, her science teacher, said, “Outcomes of science are numerous but talks of it are confined to classrooms only.”

    “Have you done your homework?” Mother asked.

    “Already”

    “Good. Then watch anything you want after 8.30. See, her gown is looking fabulous, isn't it?”

    “Yes Ma. I too want one like that.”

    “It would cost high. They are celebs and models.”

    Someone knocked the door....

    [Due to the word limit on mirakee, I am not able to post the whole story. If you want to read further, I welcome you to my instagram: sensitive_observer!]

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  • sensitive_observer 5w

    सब्र का फल
    ज़रूरी नहीं
    कि मीठा हो।
    किसने कहा
    परोपकार के बदले
    स्वर्ग मिलेगा?
    स्वर्ग होता भी है क्या?
    एक भिखारी
    अपने बच्चे को खिलाकर
    संतोष करता है,
    तो क्या उसे भूख नही सताती?
    झूठ सुनकर भी लोग
    क्या गज़ब इठलाते हैं।
    और रिश्वत लेकर
    कहाँ से कहाँ पहुंच जाते हैं।
    अच्छे काम करने के लिए
    वैसे तो कोई ख़ास वजह नहीं,
    बस इतना समझ लो
    कि ‘कोई करता नहीं’।
    अब तुम करना चाहो
    तो इतना काफी है जानना।
    वरना कोई पूछे तब भी यही कहना।
    दुनिया एक से तो बदलती नहीं,
    मैं क्या करूँ
    जब ‘कोई करता नहीं’।
    ©sensitive _observer

    #honesty #hindi #kavita #mirakee #newton

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  • sensitive_observer 5w

    Loving Vincent,

    Too many pages have been torn before. Let's see how lucky this one is. But it's just a pinch of nervousness that I've shared. It attacks when confidence goes out of stock and I have no shame in accepting that I'm unconfident right now. If you were getting a letter written by me a year before, you would have said that this boy is somehow good with words and he writes what he feels. You would have also been pleased reading that. But here I am writing to you in my most difficult times with lack of words and underconfident.

    Everything has changed for me, Vincent. And it is unbearable. Why it happens that we unconsciously shifts to another person and some day when this shift is sensed, it becomes suffocating to live inside that. Since childhood, I have seen many changes and without any alternative, adjusted with it. But this time, the cost of acceptance is too high and if I compromise, nothing would be left for me.

    If you're wondering why am I telling all this to you, it's because I saw a rebel in you. And a person who didn't accept helplessness at the cost of truth is the person whom I admire and whose gates I'll prefer to knock in the times of perplexity.

    I had never imagined that I'll be so out of words. That some day will climb over me and start yelling not to write anymore. That some nights will come and choke my brain with thoughts which I'm unable to convey. That instead of scribbling the shades of my soul, my pen will bleed cuts on a half-written article. That a writer inside me will yearn and eventually die and I'll mourn in front of you.

    May I ask you one thing?....

    Due to word limit on mirakee, I am unable to post the whole letter. If you wish to read further, you are welcomed on my insta id: sensitive_observer

    #vincent #letter #art #mirakee

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  • sensitive_observer 10w

    Lights, diya, sweets, crackers are secondary. Togetherness is the spirit of festival.

    #diwali

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  • sensitive_observer 10w

    I have never seen God. And I have never been in a romantic relationship. These concepts are so vague that sometimes they even appear to be unrealistic to me. It is exactly what I'm saying. For example, you may forcibly convert my religion at gunpoint. But you can't sow the seed of faith in the Almighty. Same with the other one. Even the most beautiful model or actress can't make me experience love for her. But even though I haven't experienced the two nor I believe it to be true, still there's something whose presence makes all the logic and rationality numb. Suddenly, I start feeling like I am in heaven or a long lost lover's soul. It's effective. It's dangerous. It's music. A song can make you dance, relaxed, stupid, introspect, a theist, a lover. A song can do miracles. It's art!

    ©sensitive_observer

    “And those who were seen dancing were thought to be insane by those who
    could not hear the music.”
    ~Friedrich Nietzsche

    #music #song

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  • sensitive_observer 11w

    आजकल काम करने लगा हूँ। सो ज़िम्मेदारियाँ भी बढ़ गयी हैं। आप अंदाज़ा लगाएं कि जो पाँव शहर की मीलों को शर्मिंदा कर देते थे, आजकल बस की सीट के नीचे किसी खोपचे में घंटों ऊंघते रहते हैं। दुनिया छोटी नहीं है और ना ही मुसाफ़िर के इरादे। छोटे तो बस इन दो पाँवों के घमंड और इनके कदम होते हैं।

    खैर, मैं कह रहा था कि ज़िम्मेदारियाँ बढ़ी हैं। अरे मत पूछो भाई। अभी थोड़ी ही देर पहले एक आदमी मेरे सामने स्कूटी से गिरा। हमारी बस के चक्के तो पूरे मूड में थे कि उसके दोनों हाथों की रोटियां बनायीं जाएँ मगर ड्राइवर साहब का पेट भरा था शायद सो उन्होंने ब्रेक लगा दिए। मैं उतरा और उस व्यक्ति को सहारा देकर उठाया। अपनी ज़िम्मेदारी बनती थी। वो भी इंसानियत की। सो निभायी।

    वापस आकर जब सीट पर बैठा तो थोड़ी नींद लग गयी। सपने में देखा कि यहाँ मम्मा और पापा सपने में भी मेरी सरकारी नौकरी के सपने संजो रहे हैं। हम भारतीय लड़कों का यही इन्सेप्शन है और अभिभावक इसके क्रिस्टोफर नोलन। मैं उनकी हाँ में हाँ मिलाकर फौरन सपने से बाहर निकल आया। एक सुपुत्र की ज़िम्मेदारी तो हमेशा निभानी होती है चाहे वो सपना हो या हकीकत। आप बस गिनते जाओ मेरी ज़िम्मेदारियाँ।

    अभी हकीकत के एक-आध धक्के खाये ही थे कि कंडक्टर आ गया। अस्सी रुपये काटकर उसने गलती से मुझे जब तीस रूपए पकड़ाये तो मैंने दस लौटाकर ईमानदार नागरिक की ज़िम्मेदारी भी निभा ही डाली।

    आगे का सफ़र लम्बा चला। इस बीच.....

    शब्द सीमा होने के कारण मैं यहां पूरी कहानी प्रेषित करने में असमर्थ हूँ। आगे की कहानी मेरे insta id पर उपलब्ध है। आशा है आप पढ़ेंगे!

    Insta: sensitive_observer

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  • sensitive_observer 14w

    परमजीत अपनी गाड़ी दरवाज़े पर लगाकर अंदर घुसा। उसकी बेटी दौड़ती हुई उससे मिलने आई। उसकी आँखों में मोटे-मोटे आँसू थे। ज्योंही परमजीत ने उसे गोद में उठाया। उसने कहा, “पापा, वो डॉक्टर अंकल बहुत गंदे हैं। देखो ना इतनी छोटी-सी चोट के लिए उन्होंने सुई दे दी। मुझे बहुत दर्द हुआ। मम्मी ने भी मना नही किया। सब गंदे हैं। आप उन्हें डांटोगे ना पापा?”

    परमजीत ने नौकर को गाड़ी में से सारे केन उतार लेने का इशारा करते हुए कहा, “हाँ मेरी बच्ची। मैं कल ही डॉक्टर अंकल के पास जाऊँगा। और खूब डाँटूंगा। तुम बोलो तो उन्हें भी सुई लगा दूँ?”

    परमजीत ने चिंकी को हँसाने के लिए मज़ाक किया। पर वो बोल पड़ी, “नहीं नहीं पापा। ऐसा मत करना बहुत दर्द होगा उन्हें।”

    तभी परमजीत के तबेले से एक गाय के चीखने की आवाज़ आयी। मानो वह कह रही हो कि मुझे भी सुबह शाम की सुइयों से बहुत तकलीफ़ होती है, परमजीत। मेरी भी बच्ची है जो मुझसे दूध मांग रही है। मैं जितना दे सकती हूँ दूँगी मगर मेरे बच्चे का हक़ तो ना छीनो। ऑक्सीटोसिन की सुइयों से ना मैं अब और माँ बन पाऊँगी, ना जी ही पाऊँगी। परमजीत, माँ नहीं कम-से-कम मुझे अपनी बेटी ही समझ लो।
    ©sensitive_observer

    #cowlove #animallove #animal #pet #writing #shortstory

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  • sensitive_observer 14w

    ............और जो मांसाहार त्यागना चाहते हैं उनके लिए और अच्छा है। उनके लिये मैं कुछ बातें अपनी तरफ़ से कहना चाहूँगा:-

    1. शाकाहार के अलावा इसका कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

    2. इसे अपनाने से पहले आपको निश्चित करना होगा कि आपकी प्रेरणा क्या है। तभी दृढ़ संकल्प आएगा।

    3. खुद पर बहुत दबाव ना दें। यह आदत बहुत पुरानी है तो छूटने में भी कुछ तो वक़्त लगेगा ही। हाँ पर इस वाक्य को अवसर भी ना समझें। जितना हो सके खाने से बचें। धीरे-धीरे एक वक़्त ऐसा आएगा जब आपका शरीर इसे खुद ही गलत समझेगा और यह आदत छूट जायेगी।

    4. यह दोस्ती छोड़ें कि तुम और मैं एक टेबल पर अलग-अलग प्रकार के भोजन कर सकते हैं। मैं तो खुले विचारों का हूँ। याद रखें कि आपको यह आदत मांसाहार की वजह से नही बल्कि संगति की वजह से ही लगी है। फिर वो चाहे बचपन से आपके माता पिता हो या किसी पार्टी में पहली बार ज़बरदस्ती दोस्तों ने खिलाया हो।

    5. और आखिरी बात। इस बात का गर्व करें और खुद में यह महसूस करें कि अब मैं एक जीवन की अहमियत जानता हूँ और मेरे कारण इस धरती पर मेरे साथ रहने वाला एक पशु स्वछन्द घूम रहा है। उसमें मैं हूँ मुझमे वो है, हम जीवन बांटते हैं। अध्यात्म भी यही कहता है। जब हम यह सोच लें तो जीभ की उतनी चिंता नहीं होती। तब यह आसान हो जाता है। तब सीने में दिल होता है और हम उसके हक़दार सच्चे इंसान कहलाते हैं।
    ©sensitive_observer

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  • sensitive_observer 14w

    एक गर्ववती हथिनी के लिए शोक मनाते हैं,
    हम वही लोग हैं जो पशुओं की चमड़ी चबाते हैं।
    अगर बकरा बेटे-सा प्यारा है तो बलिदान कहते हैं,
    धर्म त्याग सिखाता है,
    हम प्रसाद के लिए लार टपकाते हैं।

    जानवर ही सही माँ तो है वो भी,
    कितने भूखे हैं हम
    कि वो सोने जाए तो उसके बच्चे चुराते हैं?

    हमारे ना खाने से फूडचेन का संतुलन बिगड़ेगा,
    उनकी तादाद बढ़ेगी,
    तादाद तो हमारी भी खूब बढ़ रही,
    फिर हिटलर के नरसंहार को क्यों गलत ठहराते हैं?

    हाँ बिलकुल फसलें भी हैं ज़िंदा
    जिनको मार कर खाते हैं हम,
    पर क्या करें दोस्त,
    पापी पेट की ज़रूरतें मिटाते हैं।

    पर जितना हो सके उतना तो करेंगे हम,
    आखिरकार एक जान बख्श देने से
    हम कोई मरे तो ना जाते हैं।

    निरामिष-आमिष भाई-भाई
    एक ही टेबल पर खाएँगे,
    माफ़ करना,
    मगर दोस्ती में उसूल नहीं भुलाते हैं।
    ©sensitive_observer

    Instagram: @sensitive_observer

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