the_bandit_poet

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    कशिश

    एक बात कहुँ लाजवाब हो तुम
    यूं कहुँ कि मुझ शायर का आखिरी ख्वाब हो तुम
    पहली इकतरफा मुलाकात की दिल पर जो चोट पड़ी थी
    उनके आंखों व उनके होठों में खूबसूरती की जंग छिड़ी थी
    उस पल को बस दिल तक समेट लेना था
    होता बस में तो शायद तुम्हें बाहों में लपेट लेना था
    यूँ इश्क का मरीज था उस दौर में मैं पर कुछ बंदिश सी हुई
    तुझे पाने को आंखों में नामुमकिन कशिश से हुई
    दिल ने कहा
    तुम्हारी आंखों की गहराई को मापना था
    इश्क के हिस्सों के कुछ हिस्सों को आपसे बांटना था
    अफसोस वक्त बाजी पलट गया
    शायर के हिस्से की खुशी कोई और झपट गया
    चार शब्द कहां आपका आयाम बताती हैं
    बालों की खुली लट आपकी खूबसूरती को कोहिनूर बनाती हैं
    उन अनसुलझी बातों का गम के कुएं में फिक्र रहेगा
    हां जब तक लिखेगा यह शायर मेरे हसीन सपनों में तेरा जिक्र रहेगा
    हां तुझ संग कुछ पल झूमना था
    तेरे नाजुक होठों को चूमना था
    पता है तुझ पर लाल रंग कहर लगेगा
    इन मीठी बातों का ताउम्र मुझ पर जहर रहेगा
    आंखों के उजलेपन को फीके ना होने देना
    मेरी उन दो नायाब आंखों को भीगे कभी ना होने देना
    काफी कड़वी चीजें समेटे हो होठों से जाहिर है
    बहुत जज्बात लपेटने में दिल तुम्हारा माहिर है
    बस आखिरी ख्वाहिश है इस शायर की
    मुझे बस तुममेँ डूबना है
    एक उलझे माझी की तरह
    ©the_bandit_poet

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    मजदूर

    कुछ लिखूं या सब कुछ लिखूं
    आधा लिखूं या पूरा लिखूँ
    बच्चे कहूं या इन्हे मजबूर कहुँ
    मेहनती कहूं या मजदूर कहुँ

    उनकी सिर्फ एक राह
    दो वक्त की रोटी सिर्फ एक चाह
    सालों से छलनी उनकी एक दाह
    तप के भट्टी में भी न बोला वो आह

    बज्र कहूं या मजबूर कहुँ
    मेहनती कहुँ या मजदूर कहुँ

    उनके सम्मान को भस्म होते मैंने देखा है
    तपते पत्थरों पर उसके पांव को जलते मैंने देखा है
    क्या विधाता ने यही दिया यही इनके हाथ की रेखा है
    मैंने उनके नंगे बदन से रिसते लहू को देखा है

    खुद का घोंसला नहीं, मैंने लोगों का घर बनाते देखा है
    तपते सूर्य के नीचे मैंने पत्थर उठाते उसे देखा है
    वह भी छोड़ सकता है बन सकता है इंसान या खुदगर्ज
    ईश्वर ने बनाया विश्वकर्मा शायद यही माना इसने फर्ज

    कोई भी आए राजनीति में
    कहां किसी ने इनकी जिम्मेवारी उठाई
    हां वोट के कुछ दिन पहले
    मैंने देखा है बंट रही थी रोटियां व मिठाई

    मैंने इन्हें समाज का मैला उठाते देखा है
    दिल्ली के पक्के मार्ग पर इज्जत का थैला उठाते देखा है

    क्यों ना कहूं दुनिया को मतलबी में
    पैसे को देखा और बन गया तेरा भाई मैं
    मैंने रेल की पटरी पर पड़ी उस आखिरी रोटी को देखा है
    पटरी पर पड़े मृत शरीर से सट्टे उभरते मजदूर को रोते देखा है

    सुदृढ़ है वह खड़ा है मेरे घर के खंबे की तरह
    ईंटे गिर चुकी है पत्थर दीमक बेच चुके हैं
    वह मजबूत है आज भी उठाया है बोझा लोगों का
    मैंने उसे रोज देखा है दिखता है बिल्कुल मजदूर की तरह

    ©the_bandit_poet

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    बिकाऊ !

    मैं झूठ नहीं लिख सकता
    सच्चाई नहीं बदल सकता
    बंट चुका है मेरा भारत
    दलालों की पूरी हुई है सियासत
    अब यहां खुशी के फूल नहीं खिलते
    हिंदू-मुस्लिम गले नहीं मिलते
    राजनेताओं की काली करतूत काम कर गई
    मेरे भारत की एकता को भस्म कर गई

    जात में पहले बंटा था अब धर्म में तुम बांट लो
    देशद्रोही तो तुम हो ही अब अपने हिस्से की चूड़ियाँ छांट लो
    अमीर था भारत मेरा अंग्रेज लूट गए
    पर सदियों से थी जो एकता उसके ताले टूट गए

    जातियों का परिणाम आज तक भुगत रहा
    प्रगति की राह पर पीछे- पीछे हट रहा
    अपने देश से बड़ी सियासत हो गई
    दलालों को अजीज अपनी अपनी रियासत हो गई


    कारण इसका बिल्कुल साफ है
    कुछ बिके पत्रकारों कुछ राजनेता और बाकी जनता का हाथ है
    कब तक मनुष्य की मृत्यु को धार्मिक रंग दिया जाएगा
    कब तक राम रहीम की मृत्यु का जश्न मनाया जाएगा


    भाइयों फिर उठ बैठो एक दूसरे के गले लग बैठो
    रहीम को राम मानो और राम को रहीम
    जो सदियों से खा रहे हो थूक दो वो अफीम
    अपने अपने धर्म का मर्म जानो प्रेम का धागा फिर बांधो
    सबसे पहले अपनी मनुष्यता को जानना
    उसके बाद अपने अपने धर्म का ढोल बाजना

    ©the_bandit_poet

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    Lost

    These four walls are nothing but an empty cage
    My heresy mind kept my emotions in a hostage
    Heart is long dead I lying on my bed
    I have everything now but lost my shed
    Her aroma absentee from many days
    Everything is a wounded wanna scream in a full rage
    Me as a maudline boy perfectly used as a trashy toy
    Scares are visible but for all i have to show some joy
    My middle finger toward me you have lost my boy
    Gazing toward curtain searching for some sun rays
    Everything is finished still i am looking for morose ways
    Em feeling like moribund
    a complete nostalgia

    ©the_bandit_poet

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    बाजार में सबसे सस्ता है फरेब महंगी है ईमानदारी
    बिछड़ने के बाद से है दिल दिमाग भारी
    ©the_bandit_poet

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    मुझे भूल जाओ ख्याल अच्छा है
    उत्तर कहां है मेरे पास तुम्हारा सवाल अच्छा है
    ©the_bandit_poet

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    रात के अंधेरे में कुछ तो बात है
    हर प्रहर के साथ दर्द दुगना हो जाता है
    ©the_bandit_poet

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    उस की कहानी में मां-बाप का जिक्र बढ़ गया है
    लगता है बिछड़न की बेला नजदीक है
    ©the_bandit_poet

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    आखिरी बात भाग 2

    एक शक्ति है असीम है अपार है
    जिस पर कोई कोई पहुंचा कोटि-कोटि वर्षों से बंद वो द्वार है
    वह ब्रह्मा, विष्णु, महेश से कई ऊपर है
    पैगंबर, मूसा जिसके मात्र अंश हैँ
    वह सर्वत्र है सर्वशक्तिमान है
    वह आपके मन में था दिल में था जो अब मैला है
    उससे कोसों दूर जिसके मन में लालच, लोभ क्रोध का थैला है
    जितना समेटोगे उतने त्तृष्णि जरूर हो जाओगे
    हृदय में छल- कपट को बीज कर उसे कहां से पाओगे

    मैंने ईश्वर को ढूंढ लिया
    मेरे हृदय के अंतिम कोने में है
    मेरे पास है मुझ से कोसों दूर
    उसका आकार नहीं है फिर भी अथाह नूर
    ईश्वर को पत्थर रेत में ढूंढने वालों
    कर लो कोशिश भरपूर
    जिस दिन वो अंतिम कोना खोज लिया
    सब आडंबर होंगे चूर-चूर
    ईश्वर को खुश नहीं किया जा सकता
    वह भी दूर है बैरागी है
    सुख- दुख लोभ -मोह से मीलों दूर
    वह दाता है देना जानता है लेना नहीं
    बहुत दूर उसने भी अपना हृदय खोला है
    उसके पास सब है बस खाली है
    सब दुख सुख का झोला
    ©mein_vairagee
    Sunny khanna

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    आखिरी बात भाग -एक

    ठंडी हवा में बैठे तपी सूरज के नीचे
    कुछ है जो बार-बार मुझे पूछ रहा है
    मेरे हृदय के अंतिम तल तक मार कर रहा
    मेरे जिस्म की गर्मी को ठंडा कर
    या पता नहीं
    मुझे कुछ खुराफाती सूझ रहा है
    एक सत्य जिसे पाने को दफ़्न हो गए हज़ारों कण
    मेरे ईश्वर का स्वरूप मेरी कलम और ख्यालों से जूझ रहा है
    खयालों को चारों दिशाओं के प्रहरियों के पास भेजा
    उससे परमात्मा के आकार व उसके मर्म का पता पूछा
    उसका इशारा मेरी तरफ था
    यह मर्म मेरी समझ से परे था
    ख्याल समय के साथ बढ़ रहे थे
    हर कल्पना के साथ कढ़ रहे थे

    मैंने मन को काशी
    तन को काबा
    आत्मा को गुरु घर
    चेतना को अपने भीतर भेजा
    J का बस ख्याली रास्ता मिला
    राम का भक्त जातियों में मस्त है
    रहीम वालों का पशु आगुन्तक मौत से त्रस्त है
    केश वाला रीतियों में जकड़ा था
    अचम्भित
    चेतना वाला अभी वापिस नहीं लौटा था
    नाले, लम्बे वृक्ष, ठंडे झरने मृदुल फूल आदि अनंत
    अनेक चीज़ों में वही मर्मी शांति जिसका ना आदि ना अंत

    फिर क्यों मैं जाऊं काबा या काशी
    क्यूँ करूँ कुंडली का भ्र्म क्यूँ दिखाऊं राशि
    टोपी वाला ईद से जो इतरा रहा है
    वही हत्या उसे उसके अल्लाह से दूर ले जा रहा है


    ©mein_vairagee