trickypost

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🍁Thodi आँखोदेखी aur thoda ILLUSION hai. Aapun ke likhne ke STYLE me apna hi FUSION hai.

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  • trickypost 1d

    नैनों की भाषा

    मेघ गरजे बिन बदरी, गरजे बिन सावन
    बिन सावन बिन बदरी के मल्हार गूंजे।२।

    मल्हार संग सजनी के पाँव धरा पूजे।
    पूजे मन-मंदिर में, नयन साजन ढूँढे।२।
    नयन साजन ढूँढे।।

    कोरी कलाई, मुख-मंडल बहती पुरवाई,
    पुरवाई जाने कैसन आफ़त संग लायी।२।

    संग लायी साजन-बिंदी-कंगन-संदूक
    संदूक देख सजनी नयन गई पथराई।२।।
    नयन गई पथराई।

    पात-पात, डाल-डाल भयों मतवारी
    मतवारी नयनों में झूमें यौवन फुलवारी।

    यौवन फुलवारी में मंत्रमुग्ध भई सजनी
    सजनी के नयनों में साजन की बाते प्यारी
    साजन की बातें प्यारी-प्यारी।२।।

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  • trickypost 2d

    ग़ुल का गुलदस्ता

    हौसलों के मासूम ग़ुब्बारे दबोच लिए गए
    भावनाओं के समंदर भी निचोड़ दिए गए
    हाथों में ख़ाली पतेलियाँ ही है अब बची
    विकास की लूटियाँ शब्दों में ही घूम रही।।

    कोई दामाद, कोई जीजा यहाँ बना है बैठा
    कुर्सी की चाह में कफ़न समेटे है हर नेता
    जाने यह कैसी आज़ादी है कल्पनाओं की
    सेवक सेवा कम मेवा खाने में है लगा पड़ा ।।

    बस्तियों में घरों का आकार पर्वत सा हो गया
    इमारतों का बजट चाँद सा निखरता जा रहा
    अब गया जाने को कहाँ है समय किसी को
    पूर्वजों का मान अल्बम तक सिमट जो गया।।

    काग़ज़ी फूलों का बाज़ार हो गया और विशाल
    प्रकृति के फूलों का व्यापार बन गई है ढलान
    जाने ये आधुनिक युग की कैसी खिंचा-तान है
    किसान बेहाल, मंडी में फ़सल का लगा अंबार है ।

    धर्म रक्षण की नीतियों का ज़लज़ला सजा है
    शहर से गाँव तक देवताओं का बाज़ार लगा है
    राम के आदर्शों की ना कृष्ण प्रेम की परवाह है
    आराधना परपंच है, मानव लिपटा मायाजाल में है।।

    स्वाभिमान की अर्थियाँ सजाने को हरकोई बेताब है
    रंग लहूँ का भी परागकणो सा जगमगाता साफ़ है
    मिट्टी से कैसे हो लागव, पैसे के लुभावने इश्तिहार है
    क़ानून बनानेवाले अनपड़, वसूलनेवाले शिक्षित बेहिसाब है।।

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  • trickypost 3w

    ऐ दिल

    तुझसे यह ख़िलाफ़त कैसे? कैसे देखी जाती है
    सजे इन महकमों में ख़लिश कैसे सही जाती है
    उन रेशमी मोहब्बतों से तू वाक़िफ़ तो है ही ना ?
    फिर दिल से जोड़ी तार क्यूँ नहीं तोड़ी जाती है ?

    रंगों के बिछौनों संग शब्दों की माला है पिरोयीं
    हर एक लफ़्ज़ में साँसों से बंधा तू ही निर्मोही
    पर तेरा रिश्ता इस पाक मोहब्बत से है क्या ?
    सजे लिफ़ाफ़ों पर चुप्पी क्यूँ तोड़ी नहीं जाती ?

    कह भी दो हमें यह ख़िलाफ़त है ही नहीं मंज़ूर
    मैं जीवन हूँ मोहब्बत से जुड़ा नहीं कोई रंगुन
    काग़ज़ों पर दीवारों पर मुझे यूँ ना कुरेदा करो
    मेरा रिश्ता है साँसों से, मुझे यूँ ना छेड़ा करो?

    हाँ जी! दिल ही हूँ मैं लेकिन मैं सिर्फ़ दिल ही हूँ
    यूँ पन्नों पर सजाकर हमें यूँ बाज़ार ना बनाओ
    अपनी लालसा के कीचड़ का पर्व ना सजाओ
    लफ़्ज़ शायरी तक ठीक है, हमें हार ना बनाओ

    गुलदस्ता गुलाबों का सजाकर मेरा नाम ना लो
    गुल है किसी की वह उसके दामन पर दाग ना दो
    फ़िदा हो तो फ़ना होने तक कदमों का साथ बनो
    यूँ गिद्ध की फ़ितरत जैसे कामों को अंज़ाम ना दो

    मुझे कोई ख़िलाफ़त ना ख़लिश है मोहब्बत से
    मेरे वजूद को मेरा रहने दो, इसे बदनाम ना करो
    मोहब्बत आदम बनो, मोह में दानव काम ना करो
    दिल हूँ, दिल ही रहने दो! दाग़ी अब और ना करो

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  • trickypost 4w

    है कौन तू?
    तुझसे ही
    हाँ! तुझसे ही पूछ रहा हूँ
    है कौन तू?

    मेरे दिल पर राज़ करती है
    जिसे देखा ही नहीं
    अरे जिसे!
    जिसे देखा ही नही निग़ाहो में भर के
    वह दिन रात मुझसे प्यार करती है।।२।।
    है कौन तू?

    कोई परी है क्या
    कोई मुराद है क्या
    मेरे पिछले जन्म का अधूरा ख़्वाब है क्या?
    अरे है कौन तू ?

    काग़ज़ की बनायी कश्ती सी है
    बहारों के मौसम में बहती पुरवा सी है
    मौन हो कर बहती सागर की मँझधार है
    शायरी की सुनहरी किताब है
    कोई गीत है या कोई काज़ल है
    जाने क्यूँ आँखों में बसाने को मेरा दिल पागल है
    अरे है कौन तू?

    यह कैसी तपन है
    यह कैसी लगन है
    यह जोग कैसा जागा है
    मेरे नयनों में ख़्वाब क्यूँ आधा है
    इन हथेलियों को यह किसने थामा है
    बता ना
    है कौन तू?
    जिसके पीछे बन भँवरा मन भागा है

    मेरे हाथों से कलम छूट जाति है
    यह कलम की स्याही क्यूँ तेरे ही गुण गाती है
    मैं लबों पर जाने क्यूँ प्रेम के गीत है
    दिल की धड़कनों में जाने कैसा संगीत है
    मैं क्यूँ अब इतना बेचैन रहता हूँ
    बता भी दे ना?
    है कौन तू?

    करवटें बदल-बदल कर रात गुजरती है
    तेरी याद में सुबह-शाम मेरी ढलती है
    जाने कैसी अँगड़ाइया लेने लगे है
    खुली आँखों से भी सोने लगे है हम
    कुछ नहीं सुहाता यह कैसी बात है
    कहीं कोई अनहोनी का अंदेशा है
    या सब तेरी ही करामात है?
    अरे है कौन तू?

    है कौन तू?
    तुझसे ही
    हाँ! तुझसे ही पूछ रहा हूँ
    है कौन तू?

    मेरे दिल पर राज़ करती है
    जिसे देखा ही नहीं
    अरे जिसे!
    जिसे देखा ही नही निग़ाहो में भर के
    वह दिन रात मुझसे प्यार करती है।।२।।
    है कौन तू?

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  • trickypost 4w

    मोहब्बत में क्या कीजिए....

    गुलाबों से मोहब्बत में वो है मशगूल, तो क्या कीजिए
    ख़ाली पन्नों पर उन्हें लिख-लिखकर मोहब्बत कीजिए
    फ़िज़ा ने बदला है रुख़, तो आप यादों का मज़ा लीजिए
    तस्वीर भी तो नहीं है, जो ख़्वाब बुन सको बुन लीजिए

    यह मख़मलि ग़लीचे सताते है हमें भी तो क्या कीजिए
    उनसे मोहब्बत किजै या रुख़ तहख़ाने को मोड़ लीजिए
    हाँ है शरारती हमदम, तिरछी निग़ाहो से देखा कीजिए
    लबों पर कुछ थमा है उनके, इसे ज़हन में सजा लीजिए

    नवाबों के शहर में है पले-बड़े, बात उनकी माना कीजिए
    उन्हें आदत नहीं नीग़ाहे झुकाने की, आप ही शर्मा लीजिए
    हुस्न से सराबोर है उनकी कलाईयाँ, अब थाम भी लीजिए
    जन्नत की हूर है यक़ीं है, जन्नत को अपना बना लीजिए

    इस सर्द मौसम में एक ही परत है उनपर तो क्या कीजिए
    दिल में अरमानों के दीये पर उनकी तस्वीर लगा दीजिए
    कबूतर अब संदेशा नहीं देते आप ही ख़बर पहुँचा दीजिए
    कहीं देर ना हो जाए अब कोई जतन करवा भी लीजिए

    कोई आया है परदेशी उसके आँगन में तो क्या कीजिए
    मिठाइयों का दौर शुरू हुआ है, दहलीज़ पार कर लीजिए
    ले गया आपके ज़ेहन में बसे ख़्वाबों को तो क्या कीजिए
    कोई नया ग़ुलाब ढूँढिए और उसे मोहब्बत बना लीजिए

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  • trickypost 4w

    सागरिका

    किरणों के छूते ही जैसे खिलखिलाती है रेत
    वैसे ही उनके नयनों में लहराती है प्रेम की सेज़

    सूखे रेत को जैसे भींचती लहरें है अनेक
    उनके होंठों पर थमी बूँदे भी वैसी ही है रेत

    सागर से बिछड़कर जैसे तड़पती है मछलियाँ
    उनके बदन की चंचलता में गति वही है तेज़

    आग़ोश में भर तपन, जैसे शीतल करती है पवन
    उन्हीं असंख्य बूँदो को समेटे वह बहती रहती है

    पाकर सानिध्य जैसे कल्पवृक्ष होता है बड़ा
    उनके प्रेम की छाया में मैं भी मिलन को हूँ अड़ा

    जैसे मृत शिप में भी मांशपेशियाँ लेती है आकार
    मैं भी निखर रहा हूँ छोड़कर उन सारे मैं के विकार

    गोता लगाकर जैसे झूम जाता है तन-बदन
    उनके छुवन ने भर दी है कुछ ऐसी ही ठिठुरन

    जैसे मौन सागर कौतूहल करता सजाता है सावन
    वैसा ही तो है मेरी प्रेम सागरिका के मन का आँगन

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  • trickypost 4w

    कंगन-बिंदी, झुमके-पायल, श्रूंग़ार की वह क़ायल
    शायर की शायरी, कोमल काया उसका आवरण
    घर की लक्ष्मी है, काल के कपाट पर देवी काली
    नृत्य की नटरानी, ज्ञान की अधिष्ठात्री सरस्वती

    ब्रह्मांड की शक्तियों को सहेजे कोख़ में, जननी है
    अमृत के क्षीरसागर से वह करती सालो पोषण है
    कुल में जीवन का वही आरंभ तो कुल का अंत है
    नियति के कालचक्र में जकड़ा उसका जीवन है

    वर्ष के ३६५ दिन वह अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाती है
    हर मौसम में वह परिवार के लिए भोजन पकाती है
    सुबह-शाम कर्मठता से करती है वह अपना काम
    दुःख-दर्द में भी ना देती ज़िम्मेदारियों को अल्पविराम

    बिन उसके स्नेह के ना कोई जना ना कोई जनि है
    घरेलू हो या कामकाजी, उसकी कर्तव्यों से ठनी है
    युगों-युगों से पालन-पोषण करती घर की देवी है
    समाज की बुराइयों के बीच भी प्रेम ढाल अभेदी है

    आज भी वह शिक्षा से अपने अधिकारो से वंचित है
    उड़ना चाहती है पर समाज की बेड़ियों में जकड़ी है
    सम्मान की अभिलाषी है वही गंगा, वही अहिल्या है
    यम को भी जिसने ललकारा था सावित्री भी वही है

    ईश्वर दर्शन, आत्मा दर्पण, देव की पूजा थाली है
    चरण अर्पण, करती पूर्वजों का वंदन वह नारी है
    घर की चार दिवारी में जिसने देखा जग आजीवन
    बिन वेतन के भी निष्ठावान है जो वही तो नारी है।।

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  • trickypost 5w

    प्रेम सागर
    समंदर एकदिन जब उफ़ान पर था और जाकर जैसे ही साहिल से टकराया, उसने देखा की साहिल पर बैठे प्रेमी जोड़े वह एकदूजे में कुछ यूँ डूबे थे की उन्हें परवाह नहीं समंदर में उठते उफान का। यह देख समंदर ने अपनी गति को और तीव्र की और साहिल पर ज़ोर से आ धमका, ऐसा निरर्थक प्रयास समंदर ने कई बार किया लेकिन ज़्यादातर जोड़ो ने उसे नज़रंदाज़ ही किया।

    समंदर को क्रोध तो बहुत आया पर समय की गति जैसे-जैसे शीतलता को चूमने लगी वह भी उसकी ठंडक को ओढ़े उफान की बुझती ज्वाला संग मध्यम हुआ और सोचने लगा। कुछ क्षण बाद एक आवाज़ की गूँज उठी और एक शब्द निकला मैं प्रेम हूँ, तुझसा ही तो हूँ। सागर थोड़ा अचंभित हुआ और कुछ सोचकर बोला मुझसा कोई हो ही नहीं सकता इस जग में।

    प्रेम और सागर की इसी नोकझोक को दर्शाने की एक बेतुकी कोशिश करती यह काल्पनिक रचना प्रस्तुत करते है।।

    [सागर]
    खारा भी हूँ, मीठा भी हूँ और मैला भी तो मैं ही हूँ
    आग़ोश में लिए राज़ अनगिनत सहमा भी मैं ही हूँ
    मैं ही पूजा, मैं ही दर्पण, नित्त झूमता संग मेरे गगन
    बिन मेरे धरा पर जीवन का क्या कभी होता आरंभ।।

    [प्रेम]
    मिलन की तड़पन में बहता जल ख़ारा तुझसा ही तो हूँ
    यादों की चासनी का स्वप्न सलोना तुझसा ही तो हूँ
    मैली समाज की बेड़ियों संग लिपटा आज भी तो मैं हूँ
    लिए विरह के राज़ दर-ब-दर फिरता तुझसा ही तो हूँ
    मेरी पूजा, मेरा दर्पण, आनंदमयी गगन सब प्रेम ही है
    बिन प्रेम जल के मानव जीवन मृत देह सा ही तो है।।

    [सागर]
    पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक वैभव मेरा
    रावती, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा को सहेजता तन भी मेरा
    अंबर-पर्वत, पत्थर-कंकड़ मुझमें ही विलीन है
    बिन मेरे सावन के पोषो का क्या अस्तित्व है?

    [प्रेम]
    चारों दिशा में प्रेम सागर तुझसा ही तो बहता है
    पोखर-नदी-झरनो पर ही तो प्रेम गागर पलता है
    अंबर-पर्वत, पत्थर-कंकड़ प्रेमियों की दशा सा है
    प्रेम के पोषो ने ही सावन का अस्तित्व तरासा है।।

    [प्रेम]-आख़िरी दो शब्द
    तू जीवन भी है, तू ही काल है, तेरा ही यह संसार है
    तेरे किनारों पर ही तो जीवन का हुआ विकास है
    मानव के कृत्यों को धकेलता रहता है तू प्रतिदिन
    पर बिना प्रेम भाव के क्या हो सकता तेरा सम्मान है?

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  • trickypost 6w

    बूचड़खाना

    विशालकाय कमरों के बीच मंद रोशनी
    ना कोई रोशनदान ना किवाड़ों पर कड़ी
    बंद कानों के कपाटों पर शोर थमा सा
    दाब मध्यम धड़कनों पर चढ़ा हुआ सा।।

    मानव निर्मित आदिकाल के औज़ार थे
    चमक सुनहरी और बड़े ही धारदार थे
    माथे पर शून्यता, होंठों पर खामोशी थी
    उन बंद कमरे में जाने कैसी उदाशी थी।।

    आहत थे बहुत पर लब सिले-सिले से थे
    वे अंग के विभिन्न अंगों संग घिरे-घिरे थे
    मानसिक दबाव में जानो बेसुध हो गए हो
    नैनों पर घनघोर बादल बिखर गए हो।।

    मेरी आँखों को वह दृश्य आज भी कोसते है
    निर्दयी मृत प्राणियों की आँखें हमें टोहते है
    पूछते है ढेरों सवाल कटे हुए वो सर तमाम
    व्यथा को अपनी अश्रुओं से बाँधे रहते है।।

    उम्र के पड़ाव पर आ! पीड़ा को समझ रहे है
    परिवार की छत्रछाया को हम अब तरस रहे है
    पैसों के मोह ने, हाथों को क्या बना दिया था
    उस बूचड़खाने ने हमसे क्या करा दिया था।।

    मानो जीवित शव वहाँ शव को निहारते थे
    भावशून्य हाथ शव की तरकारियाँ काटते थे
    ना मोह,ना दया, ना घृणा पनपी कभी मुझमें
    अब उम्र की दहलीज़ पर करनी निहारते है।।

    किस-किस से क्षमा की याचना करूँ मैं
    जिसकी कोख़ काटी उससे क्या कहूँ मैं
    खाल उधेड़ना पशुओं की कला लगती थी
    घृणा होती है अब पश्याताप कैसे करूँ मैं।।

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  • trickypost 6w

    पायदान (सीढ़ियाँ)

    कालांतर वर्षों से जीवन की तलाश में रहा
    एक पग बढ़ाया और जीवन का ज्ञान मिला
    पग से नापता गया राह तो राहगीर मिला
    जंगल के अंधकुप्प में उसे साथी मिल गया
    मानव एक पायदान ऊपर को चड़ गया।।

    प्रकृति के दो छालों में जीवन निर्मित जौ हुआ
    नभ में नृत्य करते तारो संग वह सम्मलित हुआ
    भर लेने को चाँदनी के विचार में उत्सुक हुआ
    वृक्ष की जटाओं से चढ़ा डालियों पर झूलता रहा
    मानव एक पायदान और ऊपर को गया।।

    सपनो के सुनहरे महल का निर्माण चलने लगा
    शोध में विज्ञान के वह हर क्षण बढ़ने लगा
    अपनी अभिलाषाओं के यंत्र तरासने लगा
    पग की दूरियों को घूमते पहिए से नापने लगा
    मानव एक पायदान चढ़ ज्ञान बाटने लगा।।

    मिट्टी के घरों में ईश्वर की स्थापना जब हुयी
    एक पायदान रख ईश्वर को मचान बनाने लगा
    सुंदर कलाकृतियों से वह पर्वत सजाने लगा
    धरा को छोड़ वह नभ की ओर दौड़ लगाने लगा
    मानव पायदान की क़ीमत को आँकने लगा।।

    ईश्वर को श्रेस्ठता के लिए अंतरिक्ष साधन बना
    मानव के लिए ज्ञान और मुद्रा का विभाजन किया
    अपनी युक्ति की पन्नों पर कहानियाँ गढ़ने लगा
    वह हुआ लोभी की खुद को ईश्वर कहने लगा
    मानव पायदान की पारिवारिक धरोहर बनाने लगा।।

    आज शुरुआती दौर के ईश्वर सिखाओ पर है
    धरा पर जिसे दे पटका वह कल्पनाओं के है
    पत्थरों की पायदानों से वह नभ की ओर चला है
    जिसे श्रेस्ठ कहता था उसे वह छलने लगा है
    मानव एक और पायदान चढ़ ईश्वर होने लगा है।।

    वह भूल गया मूलभूत उन जीवन के क्रमों को
    जंगल में मानव की उत्पत्ति और उसके संघर्षों को
    पर्वतों की श्रिखलाओं में उकेरे ईश्वर के भावों को
    मानव विकास के शुरुआती उन आदिमानव को
    मानव एक पायदान ऊपर आ डोलने लगा है।।

    आज निर्मित सारे अविष्कारों की एक ख़ामियाँ है
    इमारतों में ढेरों मंज़िलों बीच असंख्य सीढ़ियाँ है
    पत्थरों की इन डगर पर फुटपाथों की लड़ियाँ है
    मंदिरों में ईश्वर और प्रार्थी के बीच सीढ़ियाँ है
    मानव एक पायदान चढ़ सब भूलने लगा है।।

    वृक्ष की लताओं से लिपटे फल अब नहीं रहे
    केले के बखारों से उत्पन्न अंश है खोने लगे
    पास था जिनके जाग सारा, सहारे पर जीने लगे है
    पर्वत की ऋंखलाओ पर पिकनिक करने लगे है
    एक पायदान के चक्कर में घनचक्कर होने लगे है।।

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