unknown_poet_ak

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Neither a poet nor an author I am just a pen who write words what he feel Dream to travel all over in india Desire my poetry book Destiny who knows

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    ख्यालो में मेरे तेरा जीकर गर काश ना आता!
    भूला देना मुझे भी बातों को थोड़ा अगर आता।
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    ये ख़त में क्या लिखा तुमने!
    तुम्हारे लफ्जों ने समझाया,
    कितना किंमती हुं मैं।
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    चले जाओ यहा से, लौटकर फिर से नहीं आना!
    मेरे गुस्से के आगे, प्यार मेरा भूल मत जाना।
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    साहित्यिक सत्य से वंचित हो, बस यही तुम्हारी कुन्ठा हैं!
    और जगत की अब है रित यही, की सत्य नही कोई सुनता है।
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    तुम्हारी कुछ, हमारी कुछ!
    चलो हम दोनो की सुन ले,
    अकेले खुद से बातें करना!
    अच्छा थोड़ी लगता हैं।
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    हकीकत

    ख़्वाहिशों की दुनिया में, कई राज तेरे दफ्न हैं!
    तु ज़िन्दगी को सच समझ, लेकिन "हकीकत" कफ्न हैं।
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    "इश्क"

    दिखाना चेहरा अपना, तो नजर थोड़ी झुका लेना।
    निगाहे मिलते ही, मैनें सुना हैं "इश्क" होता हैं!
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    मैसेज

    है रातें आजकल बेचैन सी कटने लगी मेरी!
    तुम्हारा हाल तुम भी, वक़्त हो तो "मैसेज" कर देना।
    बडे़ बेकार दिन! अब आजकल सबके गुजरते हैं,
    और ऐसे में तुम्हारी आदत है इग्नोर कर देना।
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    तुम भूल गए।

    मैं याद अभी भी करता हूं, तुम जब से मुझसे दूर गए ।
    कैसे हो मुझको बिसरा कर, आखिर कैसे "तुम भूल गए" ?
    कितने सपनों का रिश्ता था, वो डोर क्या इतनी नाजूक थी ?
    केहने से जीवन के नाते, पल भर मे कैसे टूट गए ?

    इतना कैसे नाराज हुए, कुछ याद नहीं था क्या तुमको ?
    आया था तुम्हें मनाने मैं, माने और फिर से रूठ गए ।
    जो दिल में लेकर बैठे थे, कम से कम वो बोले होते !
    क्या हाथ तुम्हारे ये ही थे, जो हाथ मे आके छूट गए ।

    कसमें वादें सब प्यार भरे, मिट्टी के मेरे खिलौने थे ।
    बस ठेस लगी इक लम्हें मे, गिर के हाथों से फूट गए ।
    जाओ - जाओ तुम खुश रेहना, मुस्कान तुम्हारी अच्छी हैं ।
    बस कसक रहेगी ये दिल में, कैसे मुझको "तुम भूल गए" ?
    ©unknown_poet_ak

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    निकल के रेत साहिल से, समंदर मे चली जाए।
    जरूरी है नहीं फिर लौटकर, वापस वही आए।
    मिसाले इक नहीं, सौ हैं! कहो कितनी कही जाए।
    सुना होगा गुजरने वाले, गुजरे तो नहीं आए।
    मुसाफिर राह भटके, और भटक के मुड़ अगर जाए।
    मुनासिब है नहीं, की! "राहें, मंजिल" उनको दिखलाए।
    बिगड़ जाती है आदत जिनकी, उनके बचपने मे ही!
    बदलते हैं नहीं वो आदत, कोई लाख समझाए।
    तजुर्बा हैं मेरा! टूटे हुए रिश्तो को देखा है,
    जो टूटे इक दफा धागे, कभी वापस ना जूड़ पाए।
    सभी की चाह है उम्मीद है, कल हो खुशी वाला!
    मगर मंजिल मिले कैसे उन्हें, जो आज सो जाए।
    ©unknown_poet_ak