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  • vasudhagoyal 5d

    अफ़सोस नहीं कोई ग़म नहीं
    अधूरें ख़्वाब जो पीछे छोड़ गई
    अनजाने में दिल के रास्ते
    ख़ुद के सपने सजाना भूल गई
    मैं नारी,अपने ही दर्पण में
    ख़ुद की पहचान भूल गई

    एक ऐसे बँधन में बँधी
    बाकी सारे बँधन खोल गई
    प्यार के कितने मोती पिरोएं
    अपनी ही माला बनाना भूल गई
    मैं नारी,अपने ही दर्पण में
    ख़ुद की पहचान भूल गई

    वह मेरा दर्पण था मुझको प्यारा
    मुस्कुराती थी जब भी प्रतिबिम्ब निहारा
    अक्स आज मैंने अपना न पहचाना
    ख़ुद को संवारना भूल गई
    मैं नारी,अपने ही दर्पण में
    ख़ुद की पहचान भूल गई
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 1w

    जब विरान रातें ढूंढती फिरती हैं नींद को
    हम तेरी यादों में खो जाया करते हैं

    ख़ामोशी खटखटाती है तन्हाइयों का दरवाज़ा
    अपनी ग़ज़लों में तुमको गुनगुना लिया करते हैं

    मचलने लगती हैं जब कुछ ख्वाहिशें है
    हम तुम्हें याद कर मुस्कुरा लिया करते हैं

    धुंधला हो जाता हैं हक़ीक़त का हर रंग
    आँखों में तेरी तस्वीर बसा लिया करते हैं

    हावी हो जाती हैं ख़लिश कुछ इस कद़र
    तेरी यादों में हम कुछ अश्क़ बहा लिया करते हैं
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 2w

    बड़ी मुद्दतों बाद आई है वस्ल की रात
    अपने हाथों से सजा दूं तुझे आज की रात
    यादों में कर लेंगे बंद हर लम्हें को
    मुख़्तसर न रह जाएं उल्फ़त की रात
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 2w

    छुपायें रखीं दिल की कशमकश जो कहनी थी
    निकल गए सफ़र पर कहीं दूर इत्तेफ़ाक की बात

    फ़ासला हुआं तनहाइयां बहुत लम्बी रहनी थी
    आँखों में सैलाब लिए आई हिज़्र की रात

    भटकते रहे यूँ ही राहों में जुदाई सहनी थी
    कहीं रुक़ गए बेबस वक़्त से खाई मात
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 2w

    कभी देखिएं भी कुछ समझिएं भी
    व्याकुलता इस चित्त की परखिएं भी
    अपने मन को शून्य से मत भरने दो
    ज़ेहन में रिक्तता मत पनपने दो

    तर्क वितर्क सब धरा रह जायेगा
    स्वार्थ जब सिर पर मंडरायेगा
    स्वाभिमान की ज्वाला में स्वार्थ को जलने दो
    ज़ेहन में रिक्तता मत पनपने दो

    सुन लो आत्मीय पुकार को
    हृदय में मचलते उफ़ान को
    निश्चल इस हिलोर को रक्त में प्रवाहित होने दो
    ज़ेहन में रिक्तता मन पनपने दो

    निष्कपट नेह बरसने दो
    ओज बूँद को अनवरत छलकने दो
    इस जीवन को अनंत प्रश्नों से मत भरने दो
    ज़ेहन में रिक्तता मत पनपने दो
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 3w

    समझते रहे जिन्हें अपना
    वह रिश्ते बड़े ज़हरीले थे

    ख़ुद को सँभालने की कोशिश में
    बार बार गिरे तुम्हारे साथ जीने के
    रास्ते बड़े पथरीले थे

    जिस बगिया में फ़ूल लगाया
    सींचते रहे उसे ख़ून पसीने से
    तब भी उगे झाड़ कंटीले थे

    होंठ खुले जब भी व्यथा कहने को
    जैसे ही हाथ आगे बढ़ाया
    काँटे चुभें नुकीले थे

    अपना सकें ना किसी और को
    न ही ख़ुद के हुएं
    यह संबंध बड़े नशीले थे

    समझते रहे जिसे हम अपना
    वह रिश्तें बड़े ज़हरीले थे ।।
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 4w

    समाज की कुरीतियों की कुलबुलाहट
    कभी मन में उठे तूफानों की सुगबुगाहट
    नहीं भाई मुझे इस ज़माने की राह
    अपनी शर्तों पर जीने की चाह
    धीरे-धीरे कुछ शब्द गणने लगे
    कुछ भाव दिल में मचलने लगे
    एक दिन लिख डाले सब जज़्बात
    उस दिन हुई ख़ुद से मुलाकात
    बह रही थी विचारों की नदी
    लगा लिखना ही है सबसे सही
    कागज कलम का थाम लिया मैंने दामन
    खिल उठा था मन का सारा चमन‌
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 4w

    तारों की छाँव में एक शाम
    विचारों से भरा एक जाम
    सुकून है लम्हा नहीं ये आम
    महसूस करों वक़्त लो थाम
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 5w

    अपने हौसलों को आज़माना हैं
    मुश्किलों में भी मुस्काना हैं
    नन्हे नन्हे कदम बढ़ा कर
    आगे ही बढ़ते जाना हैं
    प्रगति के पथ पर हो अग्रसर
    हरदम कुछ नया करते जाना हैं
    राहों के काँटे चुन चुन कर
    ख़ुद ही गुलशन नया बसाना हैं
    दृढ़ निश्चय करने वालों को
    पथ के मोड़ नहीं भटकाते हैं
    संकल्पों से लक्ष्य स्वयं ही
    पास खींचे चले आते हैं
    कुछ भी नहीं असंभव
    सुख-दु:ख तो आना-जाना हैं
    भरोसा कर लिया जब खुद़ पर
    निरंतर चलते जाना हैं।
    ©vasudhagoyal

  • vasudhagoyal 6w

    सुलगी सुलगी साँसें हैं
    धधकता है यह मन
    अन्याय की आग में
    झुलस रहा है यह तन

    ख़्वाहिशों के अवशेष हैं
    दफ़्न होना शेष हैं
    वज़ूद हुआ धुआँ धुआँ
    टीस तृषा रिक्तता का समावेश हैं

    करती रही हजार मिन्नत
    होती रही मेरी तिज़ारत
    द़स्तूर जहां का हमें न भाया
    लिख दो अब नई इबारत
    वसुधा गोयल

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    ©vasudhagoyal