vikram_sharma

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लेखक,शायर,व्यंग्यकार

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Reposts
  • vikram_sharma 4w

    मैं इतना सुलझ गया हूँ,
    कि पूरा उलझ गया हूँ।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 20w

    सवाल

    मैंने अलमारी खोली,
    दिखे कपड़े ही कपड़े,
    और कपड़ों ने मुझसे सवाल किया ...
    कपड़े बोले 'हे आदमज़ात' !
    कब पहनोगे अब मुझे?
    या छोड़ दिया मुझको भी,
    मेरी ज़रूरत ख़त्म हो जाने के बाद!
    जैसे छोड़ दिया....
    शहर के लिये गाँव को,
    नौकरी के लिये खेत को,
    फ्लैट के लिये पुश्तैनी घर को,
    अंग्रेज़ी के लिये हिन्दी को,
    कॉफी के लिये चाय को,
    प्रेमिका के लिये दोस्त को,
    पत्नी के लिये माँ-बाप को,
    बच्चों के लिये ख़ुद को।
    लेकिन किसी ने कभी,
    कोई सवाल नहीं किया...
    लेकिन जब आज,
    मैंने अलमारी खोली,
    दिखे कपड़े ही कपड़े,
    और कपड़ों ने मुझसे सवाल किया।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 22w

    Mindful purpose of lockdown :)

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    पहले हम दुनियाँ में थे,
    फिर दुनियाँ घर में आई।
    घर की दुनियाँ भी सिमटी,
    फिर दुनियाँ हम में आई।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 28w

    बाज़ारों में दिल को बेचा कोई क़ीमत नहीं मिली,
    उसके बाद तो दिल की क़ीमत पर हर पत्थर बेचा है।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 32w

    फूल बाहर से,शूल अंदर से,
    हर एक शख़्स है 'ग़ुलाब' यहाँ।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 33w

    जो मुकर गए हैं,
    वो उतर गए हैं।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 33w

    चलते-चलते ठहर गया हूँ,पता नहीं।
    पहुँचा हूँ या गुज़र गया हूँ,पता नहीं।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 36w

    हर पल 'जीना' पड़ता है,
    बस इक पल के 'मरने' के लिए।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 39w

    कौन आता है रौशनी देने,
    लोग आते हैं बस नमी देने।

    ©vikram_sharma

  • vikram_sharma 39w

    जैसे ही ख़ुद को आम किया,
    सबने मुझको नीलाम किया।

    ©vikram_sharma