yashashvigupta_07

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  • yashashvigupta_07 1h

    इस पेड में
    कल जहाँ पत्तियाँ थीं
    आज वहाँ फूल हैं
    जहाँ फूल थे
    वहाँ फल हैं
    जहाँ फल थे
    वहाँ संगीत के
    तमाम निर्झर झर रहे हैं
    उन निर्झरों में
    जहाँ शिला खंड थे
    वहाँ चाँद तारे हैं
    उन चाँद तारों में
    जहाँ तुम थीं
    वहाँ आज मैं हूँ
    और मुझमें जहाँ अँधेरा था
    वहाँ अनंत आलोक फैला हुआ है
    लेकिन उस आलोक में
    हर क्षण
    उन पत्तियों को ही मैं खोज रहा हूँ
    जहाँ से मैंने- तुम्हें पाना शुरु किया था!

  • yashashvigupta_07 3h

    उसका हाथ
    अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
    दुनिया को
    हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।

  • yashashvigupta_07 3h

    “Never throughout history has a man who lived a life of ease left a name worth remembering.”

  • yashashvigupta_07 3h

    देखो,
    तुम लौट आना।

    जब बारिश की आखिरी बूंद,
    आसमान पोंछ चुकी हो।
    जब बल खा कर चली पुरवाई,
    रूठ कर लौट जाए अपने घर।
    जब मिट्टी में दफ़्न छोटे दाने,
    अंगड़ाईयाँ लेते हुए अँकुराने लगे।
    तुम लौट आना।

    जब दिन अपना लजाया चेहरा,
    रात की ज़ुल्फ़ों की आड़ में छिपा ले।
    जब हज़ारों टिमटिमाते जुगनू,
    रात की ज़ुल्फ़ों में डेरा बना लें।
    जब रात, अपने ज़ुल्फ़ों में सजाए हुए,
    एक सफेद फूल, खूब इठलाती फिरे।
    तुम लौट आना।

    जब एक धीमा मद्धम उदास संगीत ,
    बन्द खिड़कियों से धीमे धीमे रिसने लगे।
    जब चिराग़, ले अलसाई अंगड़ाई,
    हौले हौले हर कोने में जाग उठें।
    जब मेरी देहरी का टिमटिमाता दीया,
    रोशन करना चाहे तुम्हारे लौटने की राह।
    तुम लौट आना।

    जब बादलों से झांकने लगे,
    तेज़ सुफ़ेद रौशनी की चादर।
    जब आँखों मे एक एक कर,
    जम जाएँ आँसुओं की कई परतें।
    जब तंग आ कर तन्हाईयों से,
    नमी लिए गूँज जाए एक सदा।
    तुम लौट आना,

    देखो,
    तुम लौट आना।

  • yashashvigupta_07 17h

    अब भी
    छतों पर आती हैं लड़कियाँ
    मेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ।

    गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए
    जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं
    नाले के ऊपर बनी सीढियों पर और
    फ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों पर
    चाय पी रहे हैं
    उस लड़के को घेर कर
    जो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन पर
    आवारा और श्री 420 की अमर धुनें।

    पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकान
    सामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान अख़बार भी पढ़ रहे हैं।
    उनमें सभी छात्र नहीं हैं
    कुछ बेरोज़गार हैं और कुछ नौकरीपेशा,
    और कुछ लफंगे भी

    लेकिन उन सभी के ख़ून में
    इंतज़ार है एक लड़की का!
    उन्हें उम्मीद है उन घरों और उन छतों से
    किसी शाम प्यार आयेगा!

  • yashashvigupta_07 17h

    जानता हूँ कि मैं
    दुनिया को बदल नहीं सकता,
    न लड़ कर
    उससे जीत ही सकता हूँ

    हाँ लड़ते-लड़ते शहीद हो सकता हूँ
    और उससे आगे
    एक शहीद का मकबरा
    या एक अदाकार की तरह मशहूर...

    लेकिन शहीद होना
    एक बिलकुल फ़र्क तरह का मामला है

    बिलकुल मामूली ज़िन्दगी जीते हुए भी
    लोग चुपचाप शहीद होते देखे गए हैं

  • yashashvigupta_07 20h

    वापसी 💔

    सच कहूँ
    बहुत दूर आ गया हूँ
    कितनी दूर!
    नहीं पता;
    यहाँ से तुम्हारा शहर नहीं दिखता है।
    मैं अब कवितायें लिखता हूँ
    रास्ते में बिखरे हुए तमाम पन्नों पर
    तुम्हारा नाम, तुम्हारा शहर, तुम्हारा प्यार
    सब लिख चुका हूँ।
    सच कहूँ
    अब और नहीं लिखता चाहता हूँ
    अपनी कहानी; हमारी कहानी
    मैं अब वापस लौटना चाहता हूँ
    और लिखना चाहता हूँ
    वैराग्य को, खामोशी, मौत को।
    तुम समझ रही न!
    अच्छा, सुनो! जब कभी आना इधर
    तो समेटते आना
    रास्ते भर में बिखरी हुई मेरी कविताओं को
    और ठीक उसी जगह जहाँ मैं
    औंधे मुंह गिरा पड़ा मिलूँगा
    ठीक उसी जगह उन्हे जला देना...
    पता है;
    मैं वापसी चाहता हूँ
    इन रास्तों से, कविताओं से और इस सफ़र से भी
    लेकिन सच कहूँ
    बहुत दूर आ गया हूँ
    कितनी दूर!
    नहीं पता;
    यहाँ से तुम्हारा शहर नहीं दिखता है।

  • yashashvigupta_07 1d

    बारिश की वो मीठी ध्वनि
    सुखदायक तो होती है,
    पर सुकून देती है नदी की
    वह शांत धारा ,
    नंगे पांव रेत पर चलते जाना
    पीछे पदचिह्न छोड़े,
    हाँ!समंदर का किनारा भी
    नही पंसद मुझें,
    जो अपनी धारा से
    मिटा देता है पैरों के छाप को,
    पसंद है तो बस नदी को
    महसूस करना,
    जो मीलों चली पत्थरीलें रास्तों पर
    समंदर से मिलने की ख्वाहिश लिये,
    उसके सफर में बस खो जाना ,
    हाँ ! पसंद है मुझें नदी सा हो जाना.....

  • yashashvigupta_07 2d

    अब किस लफ्ज़ में कहूँ
    अलविदा तुम्हे!
    किन आँखों से बहा दूँ
    प्यार तुम्हारा!
    मेरी प्रेयसी तुम, मेरी हमराज़
    सुनो! अब जाने भी दो
    मुमकिन नहीं इत्तिफ़ाक़ से भी
    किसी घर पर हमारा नाम होना।
    बताओ, कौन-सी राह मैं लूँ
    चले जाने को!
    अब किस लफ्ज़ में कहूँ
    अलविदा तुम्हे!
    सुनो कि यूँ न देखो मुझे
    दग़ा किस्मत ने किया है मैंने नहीं
    मुहब्बत हो तुम, चाहता रहूँगा मगर
    मुमकिन ही नहीं अपने हिस्से में शाम होना।
    मिटा दूँ प्यार, पुकारूँ
    बेवफ़ा तुम्हे!
    अब किस लफ्ज़ में कहूँ
    अलविदा तुम्हे!
    अब किस लफ्ज़ में कहूँ
    अलविदा तुम्हे!

  • yashashvigupta_07 2d

    खाली कागज़ पर क्या तलाश करते हो?
    एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।

    डाक से आया है तो कुछ कहा होगा
    "कोई वादा नहीं... लेकिन
    देखें कल वक्त क्या तहरीर करता है!"

    या कहा हो कि... "खाली हो चुकी हूँ मैं
    अब तुम्हें देने को बचा क्या है?"

    सामने रख के देखते हो जब
    सर पर लहराता शाख का साया
    हाथ हिलाता है जाने क्यों?
    कह रहा हो शायद वो...
    "धूप से उठके दूर छाँव में बैठो!"

    सामने रौशनी के रख के देखो तो
    सूखे पानी की कुछ लकीरें बहती हैं

    "इक ज़मीं दोज़ दरया, याद हो शायद
    शहरे मोहनजोदरो से गुज़रता था!"

    उसने भी वक्त के हवाले से
    उसमें कोई इशारा रखा हो... या
    उसने शायद तुम्हारा खत पाकर
    सिर्फ इतना कहा कि,
    लाजवाब हूँ मैं!